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कुलपति नियुक्ति प्रक्रिया पर विवाद, 'सर्च कमेटी ही अवैध'

7 वर्ष पहले
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रांची. मानव संसाधन विकास मंत्री गीताश्री उरांव ने कुलपतियों की नियुक्ति के लिए राजभवन द्वारा गठित सर्च कमेटी पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि कमेटी वैध नहीं है। राजभवन को लिखे पत्र में उन्होंने कहा कि विवि एक्ट में सर्च कमेटी के गठन का प्रावधान ही नहीं है। यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन है।

झारखंड विश्वविद्यालय अधिनियम में कुलपति और प्रतिकुलपति की नियुक्ति का प्रावधान है। अधिनियम के तहत राज्यपाल वीसी पद पर नियुक्ति के लिए सरकार से सहमति लेते थे। सहमति मिलने पर नियुक्ति हो जाती थी। 2013 में झारखंड विवि एक्ट में संशोधन किए बगैर नियुक्ति के लिए सर्च कमेटी गठित कर दी गई। इससे यह विवाद में आ गई। रांची विवि के पूर्व वीसी डॉ. एए खान, कोल्हान विवि के पूर्व कुलपति डॉ. सलिल राय, नीलांबर-पीतांबर विवि के पूर्व वीसी डॉ. फिरोज अहमद, विनोबा भावे विवि के पूर्व कुलपति डॉ. रवींद्र भगत की नियुक्ति विवि एक्ट के अनुसार
ही हुई थी।

यह है यूजीसी नियम

सर्च कमेटी में तीन सदस्य होंगे। इसमें अध्यक्ष के अलावा एक सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत होगा। अध्यक्ष का राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिक्षाविद या पद्म पुरस्कार विजेता होना जरूरी है। कुलाधिपति द्वारा नामित सदस्य का राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संस्थान या राष्ट्रीय स्तर के नामचीन संगठन (आईआईटी , नेशनल लॉ कॉलेज, राष्ट्रीय अनुसंधान प्रयोगशाला) का निदेशक या वीसी होना जरूरी है।

राज्य सरकार द्वारा नामित तीसरा सदस्य का ख्याति प्राप्त शिक्षविद होना जरूरी है। जिसे उच्च शिक्षा की संरचना और समस्याओं की जानकारी होनी चाहिए।

क्या है विवाद

राजभवन द्वारा गठित सर्च कमेटी में जस्टिस डीएन पटेल, मुख्य सचिव आरएस शर्मा और रांची यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति डॉ. एए खान हैं। कमेटी ने राज्य के चारों विश्वविद्यालयों में कुलपति और प्रतिकुलपति पद के लिए पहली बार 25 जनवरी को 66 अभ्यर्थियों को इंटरव्यू के लिए आमंत्रित किया था।

क्या होना चाहिए

हालांकि यूजीसी ने कुलपति की नियुक्ति के लिए सर्च कमेटी गठित करने का नियम बनाया है। इसे लागू करने के लिए विवि एक्ट में संशोधन जरूरी है।

बिहार में भी हो चुका है विवाद

बिहार सरकार ने तत्कालीन राज्यपाल देवानंद कुंवर आरोप लगाया था कि उन्होंने बिना सहमति के आठ कुलपतियों की नियुक्तिकी। फैसले के खिलाफ सरकार सुप्रीम कोर्ट गई। कोर्ट ने सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया। इसके बाद विवि अधिनियम संशोधन विधेयक-2013 को स्वीकृति प्रदान की गई। अब इसी एक्ट के तहत नियुक्तिहोती है।