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पिता और पुत्र बने विधायक, राजपरिवार ने लंबे समय तक किया राज

7 वर्ष पहले
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रांची. नाग जाति भारत की प्राचीन एवं प्रभुत्व संपन्न जाति रही है। महावंश एवं प्राचीन दक्षिण भारत के अभिलेखों में भी नागों का उल्लेख मिलता है। बेनी राम महथा और घासी राम द्वारा तैयार नाग वंशावली, जो भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड कार्नवालिस को सुपुर्द की गई थी, उसमें नागवंशी राजाओं के संबंध में कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं। जब नागवंशी महाराजा ने इस छोटानागपुर क्षेत्र में राज स्थापित किया, उस समय यहां सबसे ज्यादा आबादी आदिवासियों की थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि भी इस क्षेत्र में रहते थे। पूरब में पंचेत और दक्षिण में क्योंझर राज्य था। नागवंश के प्रथम महाराजा फणि मुकुट राय का विवाह पंचेत राज के गोवंशी शिखर क्षत्रियों के राजा के यहां हुआ था।
आक्रमणकारी क्योंझर राज्य को उन्होंने पंचेत राज्य की सहायता से पराजित किया था। कोरांबे, बरवे आदि स्थानों तक सरगुजा के रक्सेल राजाओं का अधिकार था। फणि मुकुट राय ने उन्हें भी अपना आधिपत्य स्वीकार कराया। आदिवासियों से उनका गहरा लगाव था, इसलिए कहा जाता है कि नागवंशियों की छोटानागपुर में सैन्य विजय नहीं बल्कि सांस्कृतिक विजय हुई थी। नागवंशियों के प्रथम राजा महाराज फणिमुकुट राय 16 साल की उम्र में गद्दी पर बैठे और 64 साल तक यहां राज किया। इस राजघराने का किला रातू गढ़ के नाम से जाना जाता है। जब राजा आए राजनीति में कॉलम में रातू राजघराने पर पढ़ें सतीश कुमार की रिपोर्ट।
छोटानागपुर नागवंशी राजपरिवार ने लंबे समय तक किया राज
छोटानागपुर नागवंशी राजपरिवार के 62वें एवं अंतिम महाराज चिंतामणि शरण नाथ शाहदेव ने राजनीति में कदम रखा। 1957 के विधानसभा चुनाव में वे रांची सदर सीट से विधायक चुने गए।
1962 में उन्हें बिहार विधान परिषद का सदस्य नियुक्त किया गया। राजनीतिक जीवन यात्रा में वह नेशनल रेलवे बोर्ड, जोनल रेलवे बोर्ड, छोटानागपुर संथालपरगना विकास बोर्ड के सदस्य बने। महाराज रांची यूनिवर्सिटी के लाइफ टाइम सीनेटेर भी रहे। महाराज चिंतामणि नाथ शरण शाहदेव के इकलौते पुत्र युवराज गोपाल शरण नाथ शाहदेव ने भी राजनीति में कदम रखा और दो बार हटिया विधानसभा क्षेत्र से चुने गए। 2004 में चुने जाने के बाद उन्होंने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया, लेकिन दोबारा जब 2009 में कांग्रेस के ही टिकट पर हटिया से चुने गए, तो विधायक रहते हुए ही असमय उनका निधन हो गया। 28 जून 2010 को युवराज के निधन से हटिया सीट खाली हो गई, जहां हुए उप चुनाव में आजसू पार्टी के नवीन जायसवाल विजयी हुए। युवराज की मौत से उनके बुजुर्ग पिता महाराज चिंतामणि नाथ शाहदेव पूरी तरह टूट गए और किले के भीतर ही रहने लगे।
10 जुलाई 2014 को उनका भी निधन हो गया। कांग्रेस ने युवराज की पत्नी प्रियदर्शिनी शाहदेव से संपर्क साधा और हटिया से चुनाव लड़ने का ऑफर दिया, लेकिन राजघराने ने इसे ठुकरा दिया। फिलहाल राजघराने का कोई सदस्य चुनाव नहीं लड़ रहा है, लेकिन विरासत संभाल रही हैं प्रियदर्शिनी शाहदेव।
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