रांची. नक्सल पर नकेल कसने के प्रयास चाहे जितने भी हो रहे हों, सूबे की हकीकत यह है कि पिछले तेरह वर्षों में इसकी जड़ें और मजबूत ही हुई हैं। वर्ष 2001 तक जहां प्रदेश के 14 जिले नक्सल प्रभावित थे, अब यह संख्या बढ़ कर 22 हो गई है। पहले जहां प्रदेश में केवल एमसीसी और पीडब्ल्यू समेत कुछ छिटपुट उग्रवादी संगठन थे, वहीं अब संख्या में भी इजाफा हुआ। इनकी संख्या अब डेढ़ दर्जन के करीब पहुंच चुकी है। इनमें दस संगठन अत्यधिक प्रभावी हैं। इससे साफ है कि नक्सल उन्मूलन अभियानों में केंद्र और राज्य सरकार के बीच समन्वय की कमी या फिर कागजों पर बनी बेहतरीन योजनाओं को जमीन पर उतारने में भारी गोलमाल हो जा रहा है।
यूनिफार्म सेवा का गठन या फिर पुलिस नियुक्ति में है पेंच : नक्सल उन्मूलन अभियान के लिए मैनपावर सबसे जरूरी तत्व है। पर राज्य सरकार प्रारंभ से ही पुलिस बल की कमी से जूझ रही है। केंद्रीय स्तर पर होने वाली हर बैठक में सरकार ने पुलिस और संसाधनों को रोना रोया। लेकिन अभी तक इसका कोई ठोस समाधान नहीं हो पाया है। स्थिति यह है कि राज्य में पुलिसबल की नियुक्ति हो या फिर नई यूनिफार्म सेवा का गठन, सभी अधर में लटके हुए हैं। सिपाही नियुक्ति का पेंच शैक्षणिक योग्यता को लेकर अटका हुआ है। राज्य सरकार जहां सातवीं पास को सिपाही बनाना चाह रही है, वहीं केंद्र सरकार इसके लिए दसवीं को न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता करने का दबाव दे रही है। इसके कारण नियुक्ति अभी तक लटकी है।
लेवी का धंधा नहीं हो रहा मंदा
नक्सल उन्मूलन के लिए ताबड़तोड़ चल रहे अभियानों के बावजूद नक्सली संगठनों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। इसके पीछे लेवी के रूप में आने वाली अरबों की कमाई मुख्य कारण है। पूरे रेड कारीडोर में अपनी हुकूमत कायम करने का मंसूबा पाले नक्सलियों के लिए झारखंड आय का एक बड़ा स्रोत है। राज्य के खनिजों से मिलने वाली आय तथा छिपने और ट्रेनिंग कैंप चलाने के लिए झारखंड भौगोलिक रूप से भी उनके लिए मुफीद साबित हो रहा है। यही वजह है कि माइनिंग क्षेत्रों में नक्सलवाद की जड़ें मजबूत हुई हैं। सरकारी भ्रष्टाचार भी इन्हें फलने-फूलने का मौका दे रहा है। ऐसे में राज्य के अलावा केंद्रीय स्तर से भी कड़ी मानिटरिंग ही उग्रवाद के बढ़ते कदम पर रोक लगा सकती है।
विकास कार्यों में नक्सलियों ने तय किए रेट
माइनिंग के अलावा विकास के तमाम कार्यों में भी उग्रवादियों ने अपना हिस्सा तय कर रखा है। सड़कों का निर्माण हो, भवन बनाना हो या फिर नए उद्योगों की स्थापना, हर काम के लिए लेवी की दर तय है। लेवी नहीं देने पर काम बंद होता है। या फिर कांट्रेक्टर के सामान को जलाया या उनके लोगों को शारीरिक दंड दिया जाता है।
नया ट्रेनिंग सेंटर हो तब बने बात
किसी भी लड़ाई या विधि व्यवस्था के लिए प्रशिक्षण अनिवार्य है। मैनपावर हो भी जाए, लेकिन वे प्रशिक्षित नहीं हों तो इसका लाभ नहीं मिल पाएगा। राज्य गठन के समय यहां जो मैनपावर था, आज यह संख्या बढ़कर तीन गुना से अधिक हो गई है। लेकिन काफी प्रयास के बाद भी एक भी नया ट्रेनिंग सेंटर नहीं खुल सका। बिहार के समय से ही संचालित एकमात्र ट्रेनिंग सेंटर हजारीबाग स्थित पीटीसी के भरोसे आज भी राज्य की पुलिस चल रही है।
नहीं जब्त हुई संपत्ति
उग्रवादियों की कमर तोड़ने के लिए केंद्र सरकार ने उनके आय के स्रोतों को बंद करने के प्रयास शुरू किए थे। राज्य सरकार को निर्देश दिया गया था कि वह माओवादियों की संपत्ति का पता लगाए और इसे जब्त करे। इसके तहत पुलिस को माओवादियों के कैडरों व उनके रिश्तेदारों की संपत्ति की जानकारी लेनी थी, इनके बैंक एकाउंट का पता लगाकर उसे फ्रीज करना था। पर, नाममात्र की कार्रवाई हुई है।
तभी मजबूत होगी लड़ाई
नक्सलवाद से मजबूत लड़ाई के लिए जरूरी है कि इस काम में केंद्र की पूरी मदद मिले। फंड और फंक्शनरीज भी वहां से उपलब्ध कराए जाएं। अन्य राज्यों के साथ कोआर्डिनेशन का सेंट्रल बेस्ड सिस्टम हो। इससे देश की आंतरिक सुरक्षा को मिल रही चुनौती से निजात तो मिलेगी ही, विकास का मार्ग भी प्रशस्त होगा।
सिक्योरिटी रिलेटेड एक्सपेंडीचर पर नहीं खर्च हो रही राशि
सिक्योरिटी (एसआरई) रिलेटेड एक्सपेंडिचर के तहत राज्य सरकार के वैसे खर्च आते हैं, जो नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तैनात पुलिस बल और उस क्षेत्र की सामुदायिक पुलिसिंग पर खर्च होते हैं। इस राशि को बाद में केंद्र सरकार राज्य को देती है। इसके तहत पिछले छह वर्षों में लगभग साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।
नक्सली संगठन
- भाकपा माओवादी
- टीपीसी
- पीएलएफआई
- जेपीसी
- एसपीएस
- एसजेएमएम
राज्य को चाहिए ये मदद
- संसाधनों से युक्त पुलिस ट्रेनिंग सेंटर
- आईपीएस कैडर में वृद्धि
- सभी जिलों में चलाई जाएं आईएपी और एसआरई स्कीम
- समुचित केंद्रीय बल
- पड़ोसी राज्यों के साथ समुचित समन्वय
- पर्याप्त हथियार और वाहन
केंद्रीय बलों पर 2384 करोड़ खर्च के बाद भी प्रदेश अशांत
राज्य गठन के बाद यहां शांति व्यवस्था कायम करने के लिए बुलाए गए केंद्रीय बलों पर अब तक लगभग 2384 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। फिर भी आलम यह है कि शाम छह बजे के बाद राजधानी से जिलों में जाने वाली कई सड़कें बंद हो जाती हैं। केंद्र सरकार उग्रवाद प्रभावित राज्यों में शांति कायम करने के लिए केंद्रीय बल उपलब्ध कराती है। राज्य सरकार को सबसे अधिक केंद्रीय बल सीआरपीएफ के रूप में उपलब्ध कराया गया है। राज्य गठन के समय करीब 32 कंपनी सीआरपीएफ राज्य को दी गई थी। लेकिन जब स्थिति नहीं संभली और राज्य सरकार की लगातार मांग को देखते हुए पिछले छह साल से सीआरपीएफ की कंपनियों की संख्या बढ़ाकर 70 से अधिक कर दी गई है।
नहीं दिया जा सका अंतिम रूप
राज्य गठन के बाद तीसरी बार सरेंडर पालिसी बनाई जा रही है। बाबूलाल मरांडी के कार्यकाल में पहली बार सरेंडर पालिसी बनाई गई। उस समय बड़ी संख्या में फर्जी नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया था। इसके बाद सरकार ने आकर्षक पैकेज के साथ दूसरी सरेंडर पालिसी बनाई। इसके तहत कई जिलों में उग्रवादियों ने सरेंडर तो किया, लेकिन यह आंकड़ा भी उत्साहजनक नहीं रहा। इसे देखते हुए केंद्र ने राज्य को एकबार फिर नई सरेंडर पालिसी तैयार करने का निर्देश दिया। गाइडलाइन भी दी। इसी के अनुरूप आकर्षक सरेंडर एवं पुनर्वास नीति बनाई जा रही है। मुख्य सचिव स्तर पर इसका अनुमोदन हो चुका है। लेकिन फैसला नहीं लिया जा सका है।
जेपीएचसीएल को दिए गए 8395 लाख
स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम के तहत पिछले पांच सालों में झारखंड पुलिस भवन निर्माण निगम लिमिटेड को 8395.15 लाख रुपए उपलब्ध कराए गए हैं। वर्ष 2008-09 में 2240 लाख, 2009-10 में 585 लाख, 2010-11 में 2008 लाख, 2011 12 में 3561 लाख एवं 2013-14 में मई माह तक 1905 लाख रुपए जेपीएचसीएल को उपलब्ध कराए गए थे। इस राशि से मुख्य रूप से थाना भवनों, पुलिस लाइन, पुलिस स्टाफ क्वार्टर आदि का निर्माण किया जा रहा है। जेपीएचसीएल ने इसमें से 6077 लाख रुपए के काम पूरे कर लिए हैं।
शाम में भाजपा ऑफिस जाएंगे सिंह
राजनाथ सिंह का प्रदेश भाजपा को समय भी अंतिम समय में 22 सितंबर को मिला। इसके बाद प्रदेश भाजपा कुछ रेस हुई और उनका एयरपोर्ट पर स्वागत और पार्टी मुख्यालय में अभिनंदन करने का फैसला किया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए तैयारी शुरू हुई। व इस बार राजनाथ सिंह की कोई आम बैठक या सभा तय नहीं हुई। सरकारी कार्यक्रमों में शामिल होने के बाद राजनाथ सिंह लगभग पांच बजे भाजपा मुख्यालय पहुंचेंगे। वहां उनका अभिनंदन किया जाएगा।
नई सरेंडर पालिसी में यह है खास
- सरेंडर करने वाले नक्सलियों को तीन से पांच लाख रुपए मिलेंगे।
- एक साल तक ट्रेनिंग के लिए तीन से पांच हजार रुपए मिलेंगे। विशेष परिस्थिति में इसकी अवधि बढ़ाई जा सकती है।
- सरेंडर करने वाले नक्सलियों के बच्चों को पांचवीं कक्षा तक 10 हजार, छठी और सातवीं कक्षा में 12 हजार, आठवीं से दसवीं तक 15 हजार, 11वीं-12वीं तक 20 हजार और ग्रेजुएशन तक के बच्चों को 25 हजार रुपए प्रति वर्ष देने का प्रस्ताव है।
- फ्री लीगल एड देने के लिए अलग से कोष बनेगा।
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