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ग्रामीण कार्य की सड़कों को पथ निर्माण में लेने की आपाधापी

7 वर्ष पहले
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रांची. राज्य सरकार का पथ निर्माण विभाग मनमाने ढंग से काम का रहा है। ग्रामीण कार्य विभाग की सड़कों को पथ निर्माण विभाग में लेने की आपाधापी मची है। वैसी सड़कें जिन्हें ग्रामीण कार्य विभाग केंद्र सरकार की मदद से करीब 2000 करोड़ की लागत से बना चुका है, उनके चौड़ीकरण और मजबूतीकरण के नाम पर पथ निर्माण विभाग इतनी ही राशि पानी की तरह बहा रहा है। इस कार्य में विभाग के उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों के साथ-साथ सरकार में शामिल बड़े नेताओं की भी सहभागिता बताई जाती है।
नियमों का हो रहा उल्लंघन
ग्रामीण कार्य की सड़कों को विधिवत रूप से पथ निर्माण विभाग में हस्तांतरित किए बिना इनकी निविदा निकाली गई। यह नियमों के खिलाफ है। फिलहाल आरडब्ल्यूडी की सड़कें या तो बन रही हैं, या फिर हाल में बनाई गई हैं। उसका डिफेक्ट लायबिलिटी (पांच साल) के काम का कोई भविष्य नहीं रहा। ऐसे में पथ निर्माण विभाग की निविदा की कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 299 का सीधा उल्लंघन है। ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिए सीओबीटी और प्रशासनिक स्वीकृति के बाद ही निविदा निकाला जाना वैधानिक है। लेकिन बिना प्रशासनिक अनुमोदन के ही बजटीय उपबंध से कई गुना ज्यादा योजनाओं के लिए निविदाएं आमंत्रित की जा रही हैं।
40 लाख की सड़कें दो करोड़ में
ग्रामीण सड़कों के निर्माण की लागत 40 से 50 लाख रुपए प्रति किलोमीटर आती है। जबकि उसी सड़क के चौड़ीकरण और मजबूतीकरण के नाम पर पथ निर्माण विभाग की लागत दो से सवा दो करोड़ हो जाती है। इसके पीछे कारण यह है कि पथ निर्माण विभाग ग्रामीण कार्य विभाग की पहले से बनी सड़क को उखाड़ कर उसका पुन: निर्माण करता है। इसमें 3.75 मीटर काली कृत पथ की चौड़ाई के बदले 5.5 मीटर तथा 7.5 मीटर पथ की चौड़ाई के बदले 9.0 मीटर करने के नाम पर पुन: डीपीआर तैयार की जाती है। इसके अलावा मिट्टी ढुलाई, पक्का पुल-पुलिया, नाली और गार्डवाल भी बनाया जाता है। यही वजह है कि योजना की राशि 40 लाख से बढ़कर दो करोड़ रुपए हो जाती है।
तकनीकी स्वीकृति के बाद भी बढ़ती है लागत
ग्रामीण कार्य विभाग जिन सड़कों का निर्माण करता है, उन्हीं सड़कों को फिर से पथ निर्माण विभाग द्वारा बनाने पर लागत कई गुना बढ़ जाती है। ग्रामीण कार्य विभाग की ऐसी कई सड़कें हैं, जिन्हें पथ निर्माण विभाग ने बनाया है और लागत कई गुना हो गई है। संवेदकों को आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए किसी योजना की तकनीकी स्वीकृति के छह माह के भीतर ही उसे अवक्रमित (कोडल पावर के विरुद्ध) करते हुए उसकी लागत डेढ़ से दो गुना की जा रही है। जबकि नियम कहता है कि किसी भी परिस्थिति में योजना की तकनीकी स्वीकृति के बाद उसे अवक्रमित नहीं किया जा सकता है। इसके कई उदाहरण भी हैं।
रांची-बरियातू पथ, आईआरक्यूपी (राइडिंग सरफेस की गुणवत्ता में सुधार कार्य)
तकनीकी स्वीकृति की राशि : 14 करोड़
अवक्रमित कर तकनीकी स्वीकृति की राशि : 24 करोड़
करमटोली चौक से पोटपोटो पथ भाया टैगोर हिल
तकनीकी स्वीकृति की राशि - 8.5 करोड़
अवक्रमित कर तकनीकी स्वीकृति की राशि - 29 करोड़
शाहपुर से गढ़वा पथ
तकनीकी स्वीकृति की राशि - 60 करोड़
अवक्रमित कर तकनीकी स्वीकृति की राशि - 90 करोड़
तुपुदाना बिरसा चौक पथ
तकनीकी स्वीकृति की राशि - 37 करोड़
अवक्रमित कर तकनीकी स्वीकृति की राशि - 57 करोड़
80.5 करोड़ की हुई बढ़ोतरी
इस तरह से कुल चार योजनाओं की मूल तकनीकी स्वीकृति की राशि 119.5 करोड़ में 80.5 करोड़ रुपए की बढ़ोतरी की गई। इसी तरह से राज्यभर में चल रही योजनाओं की तकनीकी राशि को अवक्रमित कर उन योजनाओं में अरबों रुपए की राशि की बढ़ोतरी की जा रही है।