रांची. मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा है कि नीति आयोग कोई भी योजना बनाते समय राज्यों का ख्याल रखे। उसे ही प्राथमिकता दे क्योंकि योजना का कार्यान्वयन राज्यों को ही करना होता है। इसलिए कार्यान्वयन करनेवाली संघीय इकाइयों पर शर्तें या फिर सभी राज्यों के लिए एक ही जैसी नीति निर्धारित करने से मूल उद्देश्य की प्राप्ति में कठिनाई होती है।
झारखंड इसका उदाहरण है। यहां की भौगोलिक स्थिति पठारी व दुर्गम है। 26 फीसदी आबादी अनुसूचित जनजातियों की है। 42 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। इसलिए केंद्रीय योजनाओं में स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप नीतियों में परिवर्तन या उसे शिथिल किया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री रविवार को दिल्ली में नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की बैठक में बोल रहे थे।
सीएम ने यह भी कहा कि केंद्रीय योजनाओं के लिए मैचिंग ग्रांट की व्यवस्था राज्य सरकार करती है। राज्यांश में साल-दर-साल बढ़ोतरी होती जा रही है। इससे राज्य की निधि पर लगातार दबाव पड़ रहा है। राज्य सरकार को स्वतंत्र रूप से योजना बनाने में कठिनाई हो रही है। उन्होंने यह भी कहा कि 13वें वित्त आयोग की अनुशंसा पर राज्य को 7238 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की जानी थी। इसके विरुद्ध अब तक मात्र 4929 करोड़ रुपए ही प्राप्त हुए हैं।
केंद्र सरकार को शेष 2300 करोड़ की राशि अविलंब विमुक्त करनी चाहिए। दास ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत राज्य सहकारी बैंक ने लगभग 50 हजार लाभुकों के बैंक खाते खुलवाए हैं। लेकिन लाभुकों को प्राप्त होनेवाले बीमा या ऋण लाभ की सुविधाएं राज्य सरकार को अपने संसाधन से देनी पड़ रही है। इसलिए इसमें नाबार्ड के माध्यम से झारखंड को सहयोग मिलना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने कोल ब्लॉक समेत कई मुद्दों पर रखा पक्ष
>बिहार के साथ पेंशन बंटवारे का आधार कर्मी नहीं, जनसंख्या होनी चाहिए। कर्मी के अनुपात में राज्य को 1:2 के अनुपात में पेंशन का भुगतान करना पड़ रहा है, जो जनसंख्या के आधार पर 1:3 होगा। इससे झारखंड पर 2600 करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
>सहकारी साख संरचना को दुरुस्त करने के लिए बैद्यनाथ समिति की अनुशंसा के आलोक में 2008 में ही केंद्र, नाबार्ड और राज्य सरकार के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ। राज्य सरकार ने अपने हिस्से का 15 करोड़ मुक्त कर दिया , जबकि केंद्र से 102.14 करोड़ की मदद अब तक नहीं मिली।
>राज्य के उपक्रमों के कोल ब्लॉक रद्द कर दिए गए हैं। उन्हें फिर आवंटित करने की आवश्यकता है, नहीं तो झारखंड सरकार द्वारा संचालित पावर प्लांटों को कोयले की आपूर्ति संभव नहीं हो पाएगी।