सारठ। सारठ विधानसभा क्षेत्र का अलुवारा गांव। गोड्डा और दुमका लोकसभा के सीमा क्षेत्र पर स्थित गांव की आबादी लगभग एक हजार है, लेकिन न बिजली की सुविधा और न ही सिंचाई की। जीविका का एकमात्र साधन खेती-बारी, लेकिन उसके लिए भी उचित साधन के लिए तरसते लोग। गांव जानेवाली कच्ची सड़क भी अत्यंत जर्जर। बरसात के दिनों में मानो कैद हो जाते हैं इस गांव के लोग। कुछ ऐसी ही कहानी सारठ विधानसभा क्षेत्र के कई गांवों की है। यहां विकास की गति अत्यंत धीमी है, जिससे चुनाव को लेकर लोगों में जबर्दस्त नाराजगी भी है। दैनिक भास्कर की टीम जब गांव का जायजा लेने वहां पहुंची, तो वोटरों ने बताया कि गांव में एक स्कूल है, पांच सौ बच्चे भी हैं, लेकिन मात्र दो शिक्षक। एक आटा चक्की है, लेकिन बिजली के अभाव में बंद पड़ी है। इसी विधानसभा क्षेत्र में ईसीएल (ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड) की चित्रा कोलियरी भी है, लेकिन उसका फायदा आम लोगों को नहीं मिल रहा है। डिंडाकुली, दाला गांव की भी कहानी अलुवारा जैसी ही है। झारखंड विधानसभा के स्पीकर शशांक शेखर भोक्ता इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। वह इस बार भी मैदान में हैं।
सारठ विधानसभा क्षेत्र में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति है। मुख्य मुकाबला झामुमो प्रत्याशी शशांक शेखर भोक्ता, भाजपा के उदयशंकर सिंह उर्फ चुन्ना सिंह और झाविमो के रणधीर सिंह के बीच है। शशांक स्पीकर हैं, तो चुन्ना सिंह चार बार सारठ से विधायक रह चुके हैं। अनुभवी नेताओं को अपेक्षाकृत कम अनुभव वाले रणधीर सिंह कड़ी चुनौती दे रहे हैं। कुल मिलाकर यहां का मुकाबला दिलचस्प होने की संभावना जताई जा रही है।
बन सकते हैं खेल बिगाड़ू
राजद प्रत्याशी सुरेंद्र रवानी और बसपा के युसुफ अंसारी खेल बिगाड़ू साबित हो सकते हैं। इन्होंने मुस्लिम और पिछड़ी जाति का वोट बटोरा, तो झामुमो को परेशानी होगी। संथाली आदिवासियों का वोट हासिल किया, तो भाजपा की परेशानी बढ़ सकती है। अगड़ी जाति का वोट भी निर्णय को प्रभावित कर सकता है।
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