(श्रीनगर में एक कार्यक्रम के दौरान पंडित जवाहर लाल नेहरू एवं शेख अब्दुल्ला - फाइल फोटो)
जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में इस बार किसके सिर पर होगा ताज और किसको मिलेगा राजनीतिक वनवास। क्या यहां भी चलेगा मोदी का जादू या फिर पीडीपी, नेशनल कॉन्फ्रेंस या कांग्रेस की बनेगी सरकार। आखिर कश्मीर की राजनीति में क्या है खास। dainikbhaskar.com आपको बता रहा है जम्मू-कश्मीर से जुड़ी हर वो बात जो जानना चाहते हैं आप। इसी कड़ी में हम आपको सिलसिलेवार बताएंगे कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के दादा शेख अब्दुल्ला द्वारा लिखी गई पुस्तक 'आतिशे-चिनार' से लिए कुछ अंशों के बारे में...
श्रीनगर। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के दादा शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में मई 1946 में कश्मीर छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई। शेख अब्दुल्ला गांधीजी से मिलने दिल्ली जा रहे थे। शेख को मुजफ्फराबाद में 20 मई, 1946 को गिरफ्तार कर लिया गया। इस दौरान हुए प्रदर्शनों में मुस्लिम कश्मीरियों को गोलियां मारी गई। उस दौरान दिल्ली के नेता महाराजा हरि सिंह का समर्थन कर रहे थे।
शेख अब्दुल्ला ने अपनी पुस्तक आतिशे चिनार में बताया है कि दूसरे विश्व युद्ध ने ब्रिटेन की स्थिति काफी कमजोर कर दी थी। विश्वशक्ति से हटकर अंतराराष्ट्रीय स्तर पर वह तीसरे दर्जे पर आ गया था। उपनिवेशों पर उसका शासन जमाए रखना असंभव हो गया था। हिंदुस्तान की राजनीतिक स्थिति से अवगत होने तथा यहां के नेताओं से बातचीत के लिए कैबिनेट मिशन प्लान आया। रियासतों के संबंध में कैबिनेट मिशन में यह मामला विचाराधीन था कि उपमहाद्वीप के भारत और पाकिस्तान दो सार्वभौमिक राष्ट्रों में विभाजन के बाद रियासतों के राजा और नवाब इस निर्णय के अधिकारी होंगे कि वे किसमें सम्मिलित हों। एक तरफ जवाहरलाल और कांग्रेस इसका विरोध कर रहे थे तो दूसरी तरफ जिन्ना और मुस्लिम लीग इसका समर्थन। किंतु कश्मीरी अवाम शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में यह गवारा नहीं कर सकते थे कि वे अपनी किस्मत का फैसला महाराजा हरि सिंह के हाथों में दे दे। अन्य रियासतों की तुलना में कश्मीर और
जम्मू की स्थिति भिन्न थी। यहां एक जन आंदोलन कश्मीर की आजादी की दहलीज पर खड़ा था, अतः इसे अन्य रियासतों के साथ नत्थी करने का विचार सर्वथा अनुचित था।
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