जम्मू. नवजात को टोकरी में रखकर माइनस 35 डिग्री सेल्सियस तापमान में 9 दिन चलते हुए अपने घर पहुंचना सुनने पर ही आश्चर्य होता है। यही नहीं बच्चे के जन्म से पहले गर्भावस्था में भी इसी तरह रोजाना आठ घंटे चलकर 9 दिन में चिकित्सक सुविधाओं तक पहुंचना एक मां के लिए कितना संघर्ष भरा है इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। लेकिन लद्दाख का एक परिवार इस संघर्ष से गुजर चुका है। बच्चे को अपनी पीठ पर लेकर इतने कम तापमान में चलना ही मां के इस संघर्ष की कहानी को बयां करता है। चिकित्सक सुविधाओं से कोसो दूर लद्दाख में हर किसी को इस तरह ही इन कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है। ये यहां रहने वाले लोगों की रोज की कहानी है।
21वीं सदी में नई टेक्नोलॉजी के आने के बाद हॉस्पिटल में आसानी से बच्चा पैदा कराया जाता है। लेकिन भारत के कई शहर और गांव आज भी इन सुविधाओं से वंचित हैं। उत्तर भारत के लद्दाख से ताल्लुक रखने वाले इस परिवार की प्रेग्नेंट औरत को हॉस्पिटल तक ले जाने के लिए 11.123 फीट की ऊंचाई पर बर्फ से ढकी नदी के किनारे से होते हुए 45 मील का लंबा सफर तय करना पड़ा वो भी -35 डिग्री तापमान में। बात यहीं नहीं रुकती, बच्चा पैदा होने के बाद इस परिवार को दोबारा उसी परिस्थिती में रोजाना 8 घंटे पैदल चलते हुए 9 दिन के बाद अपने घर वापस पहुंचना पड़ता है।
आइसलैंड के रहने वाले टिम वॉल्मर ने ट्रैकिंग करते वक्त जब इस परिवार को देखा तो आश्चर्य हुआ। उन्होंने इस परिवार को फॉलो किया और टोकरी में बच्चे को लेकर जाती महिला से जानकारी हासिल की। टिम ने डेली मेल को बताया कि उन्होंने पूरा एक दिन इस परिवार के साथ बिताया और उनकी सारी बातें सुनने के बाद पूरी जानकारी हासिल की। टिम का कहना है कि आज के समय में भी इतनी कठिनाइयों के बाद लोगों को डॉक्टरी सुविधा मिलती है ये जानकर सच में आश्चर्य होता है।
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साभार- फोटो और खबर डेली मेल