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कभी यहां रहते थे हजारों कश्मीरी पंडित, अब रह गए हैं गिने-चुने परिवार

7 वर्ष पहले
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(लाल चौक से सटी हब्बाकदल विधानसभा सीट की इस बस्ती में कभी रहती थी कश्मीरी पंडितों की चहल-पहल)
हब्बाकदल, श्रीनगर(उदय भास्कर)। लाल चौक से सटी हब्बाकदल विधानसभा सीट कभी कश्मीरी पंडितों की गढ़ रही है। लेकिन अलगाववाद और आतंकवाद शुरू होने पर कश्मीरी पंडित यहां से पलायान कर जम्मू समेत दूसरे राज्यों में जाकर बस गए। हब्बाकदल का गणपतियार मोहल्ले में अब गिने चुने पंडित परिवार रह गए हैं। श्रीनगर जिले का क्षेत्रफल में सबसे छोटा विधानसभा क्षेत्र में 11 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। नेशनल कांफ्रेस की विधायक शमीमा फिरदौस की राह इस बार आसान नहीं हैं। नेकां को अपने वोट बैंक पर भरोसा है लेकिन अगर मतदान प्रतिशत बढ़ा तो कुछ भी उलट फेर हो सकता है।

चौथे चरण में होने वाले चुनाव में हब्बाकदल में मतदान होना है। इस सीट पर पांच निर्दलीय उम्मीदवारों समेत कुल 11 उम्मीदवार मैदान में हैं। कांग्रेस ने 2002 में निर्दलीय चुनाव जीतने वाले रमन मट्टू, पीडीपी ने पत्रकार जफर मिराज, लोक जनशक्ति पार्टी के संजय सरार्फ और बीजेपी ने 2008 के चुनावों में कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लडऩे वाले मोती कौल को टिकट दिया है। मोती कोल पहले भी बीजेपी में शामिल हुए फिर छोड़ कर चले गए और अब फिर लगभग दो माह पहले दोबारा बीजेपी में शामिल हुए। पिछले चुनावों में 10 आजाद उम्मीदवारों समेत 21 प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा था।

हब्बाकदल विधानसभा क्षेत्र में लगभग 60 हजार के करीब मतदाता हैं। साल 2008 में अलगाववादियों के चुनाव बायकाट का असर हुआ और केवल 11.62 प्रतिशत मतदान हुआ। नेशनल कांफ्रेस की शमीमा फिरदौस को 2374 वोट मिले और बीजेपी के निकट प्रतिद्वंद्वी हीरा लाल चत्ता से 1703 वोटों से विजयी हुईं। नेकां को उम्मीद है कि अगर मतदान प्रतिशत अगर बढ़ता है तो उसकी जीत सुनिश्चित है। अगर मतदान प्रतिशत कम रहता है तो नेकां को सीट बचाने में मुश्किल हो जाएगी। शमीमा फिरदौस विधानपरिषद की भी सदस्य रही हैं जबकि उमर अब्दुल्ला सरकार में उन्हें राज्य महिला आयोग का चेयरपर्सन भी बनाया गया।

क्या है इस सीट का मैथामैटिकस

साल 2008 के चुनावों पर नजर डालें तो 21 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। इनमें 12 कश्मीरी पंडित उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे जिन्होंने कुल 2386 वोट हासिल किए। अगर यह वोट एकजुट होते तो नेशनल कांफ्रेस सीट नहीं जीत सकती थी। रमन मट्टू भी 2002 में 587 वोट लेकर चुनाव जीत गए। उस समय शमीमा फिरदौस को केवल 286 और बीजेपी को 416 वोट मिले। तब मतदान प्रतिशत 3.21 रहा था। इस बार चुनाव मैदान में केवल 11 प्रत्याशियों में सिर्फ 3 कश्मीरी पंडित उम्मीदवार मैदान में हैं। इस सीट पर 6 बार कश्मीरी पंडित नेकां, कांग्रेस और आजाद चुनाव जीत चुके हैं जबकि 3 बार गुलाम मोहम्मद बट लगातार विजयी रहे थे। हालांकि दस में सात बार नेकां के पास ही सीट रही है। इस बार राष्ट्रीय दलों में कांग्रेस और बीजेपी के अलावा सिर्फ लोक जनशक्ति पार्टी ने अपना उम्मीदवार संजय सरार्फ को खड़ा किया है।

बीजेपी को मोदी और पंडितों पर भरोसा

बीजेपी के अधिकतर उम्मीदवारों को अपने से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का फायदा मिलने का भरोसा है। बीजेपी को भरोसा है कि नमो के प्रभाव से पंडित वोट पार्टी को मिलेंगे। बीजेपी ने हमेशा कश्मीरी पंडितों के मुद्दे को उठाया है। चुनावों से पहले विस्थापितों को मिलने वाली आर्थिक मदद को भी 6600 से बढ़ा कर दस हजार कर दिया गया। यही वजह है कि कश्मीर में बीजेपी उम्मीदवार कभी कभार ही फोटो सेशन के लिए अपने विधानसभा क्षेत्र में नजर आए। लोकसभा चुनावों में कश्मीरी पंडितों ने पीडीपी को वोट दिया था। उनका तर्क था कि बीजेपी उम्मीदवार नहीं जीतेगा इसलिए पीडीपी को वोट दे रहे हैं। बताने को तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पक्ष में मतदान की बात कर रहे हैं लेकिन किस बदलाव के लिए उन्होंने वोट डाला है यह नजीतों से ही पता चलेगा। श्रीनगर की सीटों को जीतने में पंडित वोट अहम भूमिका निभाएगा। मिली जानकारी के मुताबिक इस सीट के लिए लगभग 8 हजार पंडितों ने वोट डालने के लिए एम फार्म लिए हैं। बीजेपी की कोशिश है कि अधिक से अधिक वोट डलवाए जाएं ताकि पार्टी सीट निकालने में कामयाब हो सके। हालांकि श्रीनगर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में आवाम से प्रत्याशियों को जिताने के लिए कहा ताकि उन्हें किसी कांधे की जरूरत न पड़े। उनका इशारा शायद उम्मीदवारों से भी था कि जमीन पर काम करें।

आवाम खफा, बायकाट पर दारोमदार

कश्मीरी पंडितों को प्रतिनिधित्व देने के लिए नेशनल कांफ्रेस ने पूर्व नौकरशाह विजयी बकाया को विधान परिषद सदस्य बनाया हुआ है। उनका कश्मीरी पंडित समाज पर अच्छी पकड़ है। लेकिन इस बार आवाम नेशनल कांफ्रेस से खफा है। हब्बादकल में ही अलगाववादियों का गढ़ मैसूमा इत्यादि इलाके आते हैं और यही वजह है कि बायकाट का प्रभाव रहा और फायदा नेशनल कांफ्रेस को मिला। हब्बाकदल के गणपतियार मोहल्ले में दुकानदार शौकत अहमद ने कहा कि वह अब वोट नहीं डालते। नेकां नेता स्वर्गीय पीएल हंडू ने उन्हें नौकरी का झांसा देकर उनका जीवन बर्बाद कर दिया और हादसे में आंख भी चली गई। अब दुकान चलाकर परिवार का पेट पालते हैं। बाढ़ के बाद सिर्फ नेकां ने अपने कार्यकर्ताओं को चेक बांटे। यहां तक कि जिनके मकानों को नुकसान भी नहीं हुआ था उन्हें भी पैसा दिया गया। चुनाव प्रचार जारी है लेकिन अभी तक इस इलाके में नेकां की शमीमा फिरदौस के अलावा कोई नहीं आया। तंग रास्ते, गलियां और मोहल्ले में बहते गंदे नाले। उपर से बाढ़ से आई मिट्टी के मलबे पड़े हुए हैं। जिन लोगों के मकानों को नुकसान हुआ या गिर गए उन्हें दोबारा बनाया जा रहा है।
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