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जानिए कब पति को अपनी पत्नी और घर अच्छा नहीं लगता

शास्त्रों के अनुसार किसी व्यक्ति के जन्म से मृत्यु तक 16 महत्वपूर्ण संस्कार बताए गए हैं

Danik Bhaskar | Aug 29, 2018, 03:38 PM IST

शास्त्रों के अनुसार किसी व्यक्ति के जन्म से मृत्यु तक 16 महत्वपूर्ण संस्कार बताए गए हैं। इन्हीं संस्कारों में से विवाह संस्कार सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। विवाह के बाद वर और वधू का ही नहीं बल्कि दो परिवारों का जीवन पूरी तरह बदल जाता है। अधिकांश परिस्थितियों में विवाह पति-पत्नी दोनों को ही सुख और समृद्धि प्रदान करता है लेकिन कुछ लोग के लिए शादी परेशानियों का कारण भी बन जाती है। किसी पति के लिए पत्नी कब समस्याओं की वजह बन जाती है, इस संबंध में आचार्य चाणक्य ने एक सटीक नीति बताई है...
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आचार्य चाणक्य कहते हैं कि...
कुराजराज्येन कुत: प्रजासुखं
कुमित्रमित्रेण कुतोऽभिनिवृति:।
कुदारदारैश्च कुतो गृहे रति:
कुशिष्यमध्यापयत: कुतो यश:।।
इस श्लोक में आचार्य चाणक्य ने राजा, मित्र, पत्नी और शिष्यों से जुड़ी खास नीति है। किन परिस्थितियों में ये सभी दूसरों के लिए परेशानियों का कारण बन जाते हैं, यह इस नीति में बताया गया है। यदि किसी व्यक्ति का मित्र जरूरत के समय धोखा दे देता है, मुश्किल समय में मदद नहीं करता है और दुष्ट स्वभाव का है तो वह कभी भी अन्य मित्रों का मन नहीं मोह सकता।
 
यदि किसी व्यक्ति की पत्नी सद्गुणों वाली और पति की सहायता करने वाली होती है तो वह इंसान जीवन में कई उपलब्धियां हासिल करता है। इसके विपरित यदि किसी व्यक्ति की पत्नी दुष्ट स्वभाव की है तो ऐसे पति कभी सुखी नहीं हो सकते। जिन लोगों की पत्नी दुष्ट स्वभाव की है, घर में बार-बार क्लेश करती है, वाद-विवाद करती है, पति और उसके परिवार का अपमान करती है  उन्हें न तो अपनी पत्नी अच्छी लगती है और ना ही खुद का घर। ऐसे लोग अधिकांश समय घर से बाहर रहने की ही कोशिश करते हैं।
 
आचार्य कहते हैं कि यदि कोई राजा प्रजा का सुख न देखते हुए स्वयं के सुख को अधिक महत्व देता है तो वह राजा राज्य करने योग्य नहीं है। ठीक इसी प्रकार आज के समय यही नीति प्रबंधक और कर्मचारी के बीच भी लागू होती है। यदि कोई प्रबंधक खुद के हित के मोह में कर्मचारियों के हित को आहत करता है तो वह अच्छा प्रबंधक नहीं कहा जा सकता है।
 

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि यदि कोई गुरु किसी मूर्ख और खोटे शिष्य को शिक्षा देता है तो उसे कभी भी समाज में मान-सम्मान प्राप्त नहीं हो सकता है। मूर्ख व्यक्ति का बहुत समझाने पर भी वह बुद्धिमान नहीं हो सकता। मूर्ख शिष्य के कारण उसका गुरु भी समाज में अपमान का पात्र बन जाता है