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जानिए, सारे शास्त्रों में गीता ही सबसे श्रेष्ठ क्यों है...

आज से हम अपने पाठकों के लिए भागवत गीता को समझने के लिए एक सीरिज शुरू कर रहे हैं।

Danik Bhaskar | Jul 12, 2018, 04:49 PM IST
उज्जैन। महाभारत के युद्ध में कुरुक्षेत्र में जब कौरव और पांडव, दोनों सेनाएं आमने-सामने थी, तब अर्जुन ने हथियार डाल दिए। कौरव सेना में खड़े अपने गुरु द्रोण, पितामह भीष्म आदि को देखकर मोहग्रस्त हो गया। उसे लगा कि अपने ही कुटुंब के लोगों, गुरुओं और भाइयों को मारकर राज्य लेने से क्या लाभ है। इससे अच्छा तो वनवास ही है। उसने हथियार रख दिए, निस्तेज होकर बैठ गया। अर्जुन के सारथी बने भगवान कृष्ण ने उसे ज्ञान दिया। भगवान के इसी ज्ञान को भगवत गीता कहा गया। भगवान द्वारा गाई गई यानी भगवत गीता।

आज से हम अपने पाठकों के लिए भगवत गीता को समझने के लिए एक सीरिज शुरू कर रहे हैं। इस सीरिज में हम अपने पाठकों को गीता के श्लोकों में छिपे उस ज्ञान को बताएंगे, जो आपको जीवन के हर क्षेत्र में सहायता करेगा। जीवन को आसान करेगा और आपमें आत्मविश्वास भर देगा। ये व्याख्या प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान डॉ. केशवराव सदाशिव शास्त्री मुसलगांवकर की पुस्तक पर आधारित है।
आगे स्लाइड में देखिए श्रीमद्भगवत गीता के अलावा और कौन सी गीताएं रची गई हैं।
डॉ. केशवराव सदाशिव शास्त्री मुसलगांवकर डॉ. केशवराव सदाशिव शास्त्री मुसलगांवकर
इस ग्रंथ में मौजूद ज्ञान को संसार का श्रेष्ठतम ज्ञान कहा गया है। सदियों से हिंदुस्तान के घर-घर में इसका पाठ हो रहा है। आईआईएम जैसी मैनेजमेंट पढ़ाने वाली संस्थाएं भी गीता के ज्ञान को मैनेजमेंट को समझने में सहायक मान रही हैं। मैनेजमेंट संस्थाओं में गीता पर लेक्चर हो रहे हैं। लगभग सात सौ श्लोकों में भगवान कृष्ण ने अर्जुन के उन सभी सवालों का जवाब दिया है, जो सवाल अक्सर हमारे मन में भी उठते रहते हैं। गीता कर्म की प्रेरणा देती है।
 
गीता उपदेश की ये सीरिज देश के ख्यात विद्वान राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित महामहोपाध्याय डॉ. केशवराव सदाशिव शास्त्री मुसलगांवकर की पुस्तक गीतातत्वमीमांसा से लिया जा रहा है। डॉ. मुसलगांवकर को राष्ट्रपति पुरस्कार के साथ ही, राष्ट्रिय कालीदास सम्मान, राजशेखर सम्मान, भरतमुनि सम्मान, विद्वत भूषण आदि सम्मानों सम्मानित किया जा चुका है। वे अभी तक संस्कृत भाषा में दर्जनभर से ज्यादा ग्रंथों की रचना कर चुके हैं।
 
 
कम ही लोग जानते हैं कि श्रीमद्भगवत गीता के विश्वविख्यात होने के बाद कई गीताओं की रचना की गई। इसके पीछे कारण ये था कि किसी भी पंथ, संप्रदाय या पुराण में इस जैसी कोई पुस्तक हुए बिना उस पंथ, संप्रदाय या पुराण की पूर्णता नहीं होती। इनमें से कुछ गीताएं तो महाभारत के शांतिपर्व के छोटे-छोटे प्रकरणों को लेकर ही रची गई हैं। कुछ दूसरे पुराणों के आख्यानों पर रची गई हैं।
 
 
ये हैं कुछ प्रमुख गीताएं 
 
पिंगल गीता, शपांक गीता, बौध्यगीता, विचखन्युगीता, हारित गीता, पराशर गीता, वृत्रगीता, हंस गीता। ये सारी गीताएं महाभारत के शांतिपर्व के अंतर्गत आने वाले मोक्षपर्व के कुछ प्रकरणों को लेकर रची गई है। महाभारत के ही अश्वमेधपर्व की अनुगीता का एक विशेष भाग ब्राह्मण गीता है। इसके अलावा अवधूत गीता, अष्टावक्र गीता, ईश्वर गीता, उत्तर गीता, कपिल गीता, गणेश गीता, देवी गीता, पांडव गीता, यम गीता, राम गीता, व्यास गीता, शिव गीता और सूर्य गीता जैसी अनेक गीताएं प्रसिद्ध हैं। 
 
 

यदि ज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो इन सब गीताओं में भगवत गीता के मुकाबले किसी में कोई खास विशेषता नहीं हैं। भगवत गीता में अध्यात्म और कर्म का मेल कर देने की जो अपूर्वशैली है वो किसी अन्य गीता में नहीं है। यही कारण है कि इतनी गीताओं में विद्वानों और संतों ने केवल भागवत गीता पर ही सबसे ज्यादा ध्यान दिया।