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अपने पुत्र के हाथों मारे गए थे अर्जुन, जानिए कैसे हुई ये अद्भुत घटना

Dainik Bhaskar

Sep 17, 2014, 01:00 AM IST

महर्षि वेदव्यास और श्रीकृष्ण के कहने पर पांडवों ने अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया। यज्ञ के घोड़े का रक्षक अर्जुन को बनाया गया।

mahabharat series- 20, Arjuna killed by His own son, know How did this amazing event.
उज्जैन। महाभारत सीरीज-19 में अब तक आपने पढ़ा कि युद्ध समाप्त होने के बाद जब पांडव हस्तिनापुर गए तो वहां धृतराष्ट्र ने भीम का वध करने का प्रयास किया, लेकिन श्रीकृष्ण की सूझ-बूझ से वह बच गए। गांधारी ने कौरवों के विनाश का कारण श्रीकृष्ण को माना और उनके द्वारा युदवंश का नाश होने का श्राप दे दिया। कुंती ने जब पांडवों को बताया कि कर्ण उनका बड़ा भाई था, तो ये जान कर वे बहुत दुखी हुए। हस्तिनापुर में युधिष्ठिर का राज्याभिषेक किया गया। इसके बाद श्रीकृष्ण के कहने पर युधिष्ठिर भीष्म पितामह से राजधर्म की शिक्षा लेने उनके पास गए।
महाभारत सीरीज-20 में आगे पढि़ए महर्षि वेदव्यास और श्रीकृष्ण के कहने पर पांडवों ने अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया। यज्ञ के घोड़े का रक्षक अर्जुन को बनाया गया। वह घोड़ा घूमता-घूमता मणिपुर चला गया। वहां का राजा बभ्रुवाहन अर्जुन का पुत्र था। बभ्रुवाहन और अर्जुन के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में अर्जुन की मृत्यु हो गई। बाद में नागकन्या उलूपी द्वारा दी गई संजीवन मणि से अर्जुन पुनर्जीवित हो गए।

महाभारत सीरीज-20 में आगे पढि़ए-

- कैसे निकले थे भीष्म पितामह के प्राण?

- युधिष्ठिर से किसने कहा था अश्वमेध करने के लिए?

- श्रीकृष्ण ने किस मृत शिशु को किया था जीवित?

- किसे बनाया था यज्ञ के घोड़े का रक्षक?

- किसके उकसाने पर बभ्रुवाहन ने किया था अर्जुन से युद्ध?

- कैसे हुई थी अर्जुन की मृत्यु?

- मरकर पुनर्जीवित कैसे हो गए थे अर्जुन?

- युधिष्ठिर ने किसे दान कर दी थी संपूर्ण पृथ्वी?


तस्वीरों का इस्तेमाल प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।


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मस्तक फोड़कर निकले थे भीष्म पितामह के प्राण
 
- भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को लेकर भीष्म पितामह के पास पहुंचे। उस समय भीष्म के आसपास अनेक ऋषि-मुनि उपस्थित थे। श्रीकृष्ण के कहने पर भीष्म पितामह ने कई दिनों तक युधिष्ठिर को राजनीति, धर्म व अन्य विषयों पर उपदेश दिया। इसके बाद भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा कि अब तुम जाओ और जब सूर्य उत्तरायण हो जाए तब आना। उसी समय मैं प्राणों का त्याग करुंगा। 
 
युधिष्ठिर ने ऐसा ही किया और हस्तिनापुर आकर न्यायपूर्वक शासन करने लगे। कुछ दिनों बाद जब सूर्यदेव उत्तरायण हो गए, तब पांडव, धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती व श्रीकृष्ण सहित अन्य सभी लोग भीष्म पितामह के पास पहुंचे। उस समय भीष्म पितामह को बाणों की शय्या पर लेटे 58 दिन हो चुके थे। अपने परिजनों को आया देखकर भीष्म ने सभी को धर्म का पालन करने का उपदेश दिया और अपने प्राण त्याग दिए। 

उस समय सभी ने देखा कि भीष्म का प्राण उनके जिस अंग को त्यागकर ऊपर उठता था। उस अंग के बाण अपने आप निकल जाते और उनका घाव भी भर जाता। देखते ही देखते भीष्म का शरीर बाणों से रहित हो गया और उनके प्राण मस्तक (ब्रह्मरंध्र) फोड़कर आकाश में विलीन हो गए। इसके बाद पांडवों ने शास्त्रीय विधि से भीष्म पितामह का अंतिम संस्कार किया। 
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महर्षि वेदव्यास ने कहा था अश्वमेध यज्ञ करने के लिए

- भीष्म पितामह की मृत्यु से युधिष्ठिर को बहुत दुख हुआ। तब महर्षि वेदव्यास व श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया और धर्मपूर्वक शासन करने के लिए कहा। शोक निवारण के लिए महर्षि वेदव्यास ने युधिष्ठिर से अश्वमेध यज्ञ करने के लिए भी कहा। तब युधिष्ठिर ने कहा कि इस समय राजकोष खाली हो चुका है। अश्वमेध यज्ञ करने के लिए बहुत से धन की आवश्यकता होती है, जो अभी उपलब्ध नहीं है।

युधिष्ठिर की बात सुनकर महर्षि वेदव्यास ने बताया कि पूर्व काल में राजा मरुत्त ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया था। उस यज्ञ में उन्होंने ब्राह्मणों को बहुत सा सोना दिया था। बहुत अधिक मात्रा में होने के कारण ब्राह्मण वह सोना अपने साथ नहीं ले जा पाए। वह सोना आज भी हिमालय पर पड़ा है। उस धन से अश्वमेध यज्ञ किया जा सकता है। युधिष्ठिर ने ऐसा ही करने का निर्णय लिया।
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श्रीकृष्ण ने किया था मृत शिशु को जीवित

- महर्षि वेदव्यास के कहने पर पांडव हिमालय गए और वहां राजा मरुत्त के धन को प्राप्त कर लिया। उस धन को ढोने के लिए पांडव बहुत से हाथी-घोड़े व सेना लेकर गए थे। उनकी संख्या इस प्रकार है- साठ हजार ऊंट, एक करोड़ बीस लाख घोड़े, एक लाख हाथी, रथ और छकड़े। इनके अलावा गधों और मनुष्यों की तो गिनती ही नहीं थी। इस प्रकार इतना सारा धन लेकर पांडव हस्तिनापुर लेकर आने लगे। 

इधर हस्तिनापुर में अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ से एक मृत शिशु का जन्म हुआ। जैसे ही ये बात द्रौपदी, सुभद्रा व अन्य लोगों को पता चली तो उनका रो-रो कर बुरा हाल हो गया। तभी वहां भगवान श्रीकृष्ण आए। उन्हें देखकर द्रौपदी, सुभद्रा और उत्तरा ने कहा कि आपने इस पुत्र को जीवित करने की प्रतिज्ञा की थी, उसे पूर्ण कीजिए। तब श्रीकृष्ण ने उस मृत बालक को अपने हाथ में लिया और देखते ही देखते उसे जीवित कर दिया। श्रीकृष्ण ने ही उस बालक का नाम परीक्षित रखा।
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अर्जुन को बनाया था यज्ञ के घोड़े का रक्षक

- जब वह बालक एक महीने का हो गया, तब पांडव हिमालय से वह धन लेकर हस्तिनापुर आए। पांडवों को जब परीक्षित के जन्म के बारे में पता चला तो बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की। इसके बाद पांडवों ने महर्षि वेदव्यास और श्रीकृष्ण के कहने पर अश्वमेध यज्ञ करने का विचार किया। पांडवों ने शुभ मुहूर्त देखकर यज्ञ का शुभारंभ किया और अर्जुन को रक्षक बना कर घोड़ा छोड़ दिया।
 
वह घोड़ जहां भी जाता, अर्जुन उसके पीछे जाते। अनेक राजाओं ने पांडवों की अधीनता स्वीकार कर ली। वहीं, कुछ ने मैत्रीपूर्ण संबंधों के आधार पर पांडवों को कर देने की बात मान ली। किरात, मलेच्छ व यवन आदि देशों के राजाओं ने यज्ञ को घोड़े को रोक लिया। तब अर्जुन ने उनसे युद्ध कर उन्हें पराजित कर दिया। इस तरह विभिन्न देशों के राजाओं के साथ अर्जुन को कई बार युद्ध करना पड़ा।
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उलूपी ने उकसाया था बभ्रुवाहन को युद्ध के लिए
 
- यज्ञ का घोड़ा घूमते-घूमते मणिपुर पहुंच गया। यहां की राजकुमारी चित्रांगदा से अर्जुन को बभ्रुवाहन नामक पुत्र था। बभ्रुवाहन ही उस समय मणिपुर का राजा था। जब बभ्रुवाहन को अपने पिता अर्जुन के आने का समाचार मिला तो उनका स्वागत करने के लिए वह नगर के द्वार पर आया। अपने पुत्र बभ्रुवाहन को देखकर अर्जुन ने कहा कि मैं इस समय यज्ञ के घोड़े की रक्षा करता हुआ तुम्हारे राज्य में आया हूं। इसलिए तुम मुझसे युद्ध करो।

जिस समय अर्जुन बभ्रुवाहन से यह बात कह रह था, उसी समय नागकन्या उलूपी भी वहां आ गई। उलूपी भी अर्जुन की पत्नी थी। उलूपी ने भी बभ्रुवाहन को अर्जुन के साथ युद्ध करने के लिए उकसाया। अपने पिता अर्जुन व सौतेली माता उलूपी के कहने पर बभ्रुवाहन युद्ध के लिए तैयार हो गया। अर्जुन और बभ्रुवाहन में भयंकर युद्ध होने लगा। अपने पुत्र का पराक्रम देखकर अर्जुन बहुत प्रसन्न हुए।


अर्जुन का विवाह चित्रांगदा से कैसे हुआ व बभ्रुवाहन के बारे में अधिक जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-  http://religion.bhaskar.com/news/DHA-UTS-utsav-pandavas-had-created-a-special-rule-for-the-draupadi-know-unheard-things-4465058-PHO.html
 
 
 
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बभ्रुवाहन के बाण से हुई थी अर्जुन की मृत्यु

- बभ्रुवाहन उस समय युवक ही था। अपने बाल स्वभाव के कारण बिना परिणाम पर विचार कर उसने एक तीखा बाण अर्जुन पर छोड़ दिया। उस बाण को चोट से अर्जुन बेहोश होकर धरती पर गिर पड़े। बभ्रुवाहन भी उस समय तक बहुत घायल हो चुका था, वह भी बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। तभी वहां बभ्रुवाहन की माता चित्रांगदा भी आ गई। अपने पति व पुत्र को घायल अवस्था में धरती पर पड़ा देख उसे बहुत दुख हुआ। 

चित्रांगदा ने देखा कि उस समय अर्जुन के शरीर में जीवित होने के कोई लक्षण नहीं दिख रहे थे। अपने पति को मृत अवस्था में देखकर वह फूट-फूट कर रोने लगी। उसी समय बभ्रुवाहन को भी होश आ गया। जब उसने देखा कि उसने अपने पिता की हत्या कर दी है तो वह भी शोक करने लगा। अर्जुन की मृत्यु से दुखी होकर चित्रांगदा और बभ्रुवाहन दोनों ही आमरण उपवास पर बैठ गए।
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संजीवन मणि द्वारा पुनर्जीवित हो गए थे अर्जुन

- जब नागकन्या उलूपी ने देखा कि चित्रांगदा और बभ्रुवाहन आमरण उपवास पर बैठ गए हैं तो उसने संजीवन मणि का स्मरण किया। उस मणि के हाथ में आते ही उलूपी ने बभ्रुवाहन से कहा कि यह मणि अपने पिता अर्जुन की छाती पर रख दो। बभ्रुवाहन ने ऐसा ही किया। वह मणि छाती पर रखते ही अर्जुन जीवित हो उठे। अर्जुन द्वारा पूछने पर उलूपी ने बताया कि यह मेरी ही मोहिनी माया थी। उलूपी ने बताया कि छल पूर्वक भीष्म का वध करने के कारण वसु (एक प्रकार के देवता) आपको श्राप देना चाहते थे। 

जब यह बात मुझे पता चली तो मैंने यह बात अपने पिता को बताई। उन्होंने वसुओं के पास जाकर ऐसा न करने की प्रार्थना की। तब वसुओं ने प्रसन्न होकर कहा कि मणिपुर का राजा बभ्रुवाहन अर्जुन का पुत्र है यदि वह बाणों से अपने पिता का वध कर देगा तो अर्जुन को अपने पाप से छुटकारा मिल जाएगा। आपको वसुओं के श्राप से बचाने के लिए ही मैंने यह मोहिनी माया दिखलाई थी। इस प्रकार पूरी बात जान कर अर्जुन, बभ्रुवाहन और चित्रांगदा भी प्रसन्न हो गए। अर्जुन ने बभ्रुवाहन को अश्वमेध यज्ञ में आने का निमंत्रण दिया और पुन: अपनी यात्रा पर चल दिए। 
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ब्राह्मणों को दान कर दी थी युधिष्ठिर ने संपूर्ण धरती

- इस प्रकार अर्जुन अन्य देशों के राजाओं को पराजित करते हुए पुन: हस्तिनापुर आए। अर्जुन के आने की खबर सुनकर युधिष्ठिर आदि पांडव व श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए। तय समय पर उचित स्थान देखकर यज्ञ के लिए भूमि का चयन किया गया। शुभ मुहूर्त में यज्ञ प्रारंभ किया गया। यज्ञ को देखने के लिए दूर-दूर से राजा-महाराजा आए। पांडवों ने सभी का उचित आदर-सत्कार किया।
बभ्रुवाहन, चित्रांगदा व उलूपी भी यज्ञ में शामिल होने आए।

यज्ञ संपूर्ण होने पर युधिष्ठिर ने पूरी धरती ब्राह्मणों को ही दान कर दी है। तब महर्षि वेदव्यास ने कहा कि ब्राह्मणों की ओर से यह धरती मैं पुन: तुम्हे वापस करता हूं। इसके बदले तुम सभी ब्राह्मणों को स्वर्ण दे दो। युधिष्ठिर ने ऐसा ही किया। युधिष्ठिर ने सभी ब्राह्मणों को तीन गुणा सोना दान में दिया। इतना दान पाकर ब्राह्मण भी तृप्त हो गए। ब्राह्मणों ने पांडवों को आशीर्वाद दिया। इस प्रकार अश्वमेध यज्ञ सकुशल संपन्न हो गया।
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