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धीरे-धीरे आपको दरिद्र बना देता है ऐसा पैसा, जानें ग्रंथों में बताई 8 रहस्यमई बातें

ऐसे पैसों को अपने पास रखने वाला बनने लगता है दरिद्र, जानें 8 रहस्यमई बातें

Dainik Bhaskar

Dec 26, 2017, 05:00 PM IST
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महाभारत के एक बहुत ही खास अंग है विदुर नीति, जिसमें महात्मा विदुरजी ने कई काम की बातें और नीतियां बताई है। वो बातों न की सिर्फ उस समय काम की थी बल्कि आज भी बहुत महत्व रखती है। अगर कोई भी इंसान इन बातों को ध्यान रखें तो उसे जीवन की हर सफलता और सुख मिल सकते हैं। इस स्टोरी में हम 8 ऐसी ही विदुर नीतियों के बारे में बताएंगे।

1. अतिक्लेशेन येर्था: स्युर्धर्मस्यातिक्रमेण वा ।

अरेर्वा प्रणिपातेन मा स्म तेष मन: कृथा: ।।

अर्थ- जो धन बहुत ज्यादा क्लेश के बाद, धर्म का उल्लंघन करने से या शत्रु के सामने सिर झुकाने से मिलता हो, ऐसे धन की चाह नहीं रखनी चाहिए। इस तरह पाए गए धन को अपने पास रखने वाला धीरे-धीरे दरिद्र बनने लगता है।

2. निश्चित्य य: प्रक्रमते नान्वर्तसति कर्मण: ।

अवन्धकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते ।।

अर्थ- कोई भी काम शुरु करने से पहले उसके फायदे, नुकसान, समय, स्थिति सामथर्य, रुचि, आवश्यकता, परेशानियां और उनके उपायों के बारे में सोचने वाला और काम शुरू करने के बाद उसे घबराकर, हिम्मत हारकर या आलस्य जैसे किसी भी बीच में न छोड़ने वाला ही सफल होता है।

3. अमित्र कुरुते मित्रं मित्रं द्वेष्टि हिनस्ति च ।

कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मूढचेतमस ।।

अर्थ- जो व्यक्ति शत्रु को अपना मित्र समझकर उसपर विश्वास करता है और छोटी-सी बात पर मित्र को अपना शत्रु समझकर उसपर शक करता है, ऐसा मनुष्य सबसे बड़ा मुर्ख माना जाता है।

4. एकमेवाद्वितीयं तद् यद् राजन्नवबुध्यसे ।

सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव ।।

अर्थ- जैसे समुद्र के पार जाने के लिए नाव ही एकमात्र साधन होता है, उसी तरह स्वर्ग पाने के लिए सत्य ही एकमात्र साधन है। इसलिए हम परिस्थिति में सत्य का ही साथ देना चाहिए।

5. असंविभागी दुष्टात्मा कृतघ्नो निरपत्रप: ।

ताद्ड् नराधिपो लोके वर्जनीयो नराधिप ।।

अर्थ- जो व्यक्ति अपने पर आश्रित दूसरे लोगों को धन बांटे बिना ही सारे धन का सुख खुद अकेले लेता है, जो दुष्ट और बेशर्म होता है। ऐसे मनुष्य को कोई पसंद नहीं करता।

6. यत्र स्त्री यत्र कितावो बाजो यत्रानुशासिता ।

मज्जन्ति तेडवशा राजन्नघामश्मप्लवा इव ।।

अर्थ- जिस घर के लोग स्त्रियों, जुआरियों और अनुभवहीन लोगों के कहने पर चलता है, वहां के लोग उसी तरह विपत्ति के समुद्र में डूब जाते हैं। जिस तरह पत्थर की बनी नाव पर बैठने से नदी में डूबना निश्चित होता है।

7. तपो बलं तापसानां ब्रह्म ब्रह्मविदां बलम् ।

हिंसा बलमसाधूनां क्षमा गुणवतां बलम् ।।

अर्थ- तपस्वियों की ताकत होती है उनका तप, वेदवेत्तों की ताकत होती है उनका वेदज्ञान, दुष्टों की ताकत होती है उनकी हिंसा और गुणवान लोगों की ताकत होती है उनकी क्षमा करने की आदत।

8. अनृते च समुत्कर्षो राजगामि च पैशुनम् ।

गुरोच्शालीकनिर्बन्ध: समानि ब्रह्माहत्यया ।।

अर्थ- झूठ का साथ देकर उन्नति करना, दूसरों की बिना वजह चुगली करना, गुरु से भी झूठ बोलकर आज्ञा लेना- ये तीनों काम ब्रह्महत्या के समान मानी जाती है।

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