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युद्ध से पहले ही इस कारण दुर्योधन करना चाहता था आत्महत्या

आज हम आपको महाभारत में लिखी एक ऐसी ही रोचक बात बता रहे हैं, जो बहुत कम लोग जानते हैं।

Danik Bhaskar | Dec 06, 2017, 05:00 PM IST

महाभारत ग्रंथ में कई ऐसी बातें हैं जो न कभी दिखाई गई और न ही कभी बताई गई। आज हम आपको महाभारत में लिखी एक ऐसी ही रोचक बात बता रहे हैं, जो बहुत कम लोग जानते हैं। दुर्योधन के बारे में तो हम सभी जानते हैं कि वह धृतराष्ट्र का सबसे बड़ा पुत्र था और युद्ध का मुख्य कारण भी वही था।
लेकिन बहुत कम लोग ये बात जानते हैं कि एक समय ऐसा भी आया था जब दुर्योधन आत्महत्या करना चाहता था, इसके लिए उसने अन्न-जल भी छोड़ दिया था, लेकिन बाद में राक्षसों के कहने पर उसने ये विचार छोड़ दिया। ये पूरी घटना कब और कैसे हुई, ये जानने के लिए आगे की स्लाइड्स पर क्लिक करें-

तस्वीरों का इस्तेमाल प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।



इसलिए द्वैतवन गया था दुर्योधन
वनवास के दौरान जब पांडव द्वैतवन में निवास रहे थे। तब ये बात शकुनि को पता लग गई। उसने जाकर यह बात कर्ण और दुर्योधन को भी बताई और कहा कि क्यूं न हम खूब ठाट-बाट से द्वैतवन चलें, जिसे देखकर पांडवों जल-भून जाएं। दुर्योधन को भी ये बात अच्छी लगी और अगले ही दिन वह अपने दल-बल के साथ द्वैतवन पहुंच गया।
दुर्योधन ने अपने सेवकों को आदेश दिया कि इस सरोवर के निकट एक क्रीडा भवन तैयार करो। दुर्योधन की आज्ञा से सेवक उस सरोवर पर गए, लेकिन गंधर्वों ने उन्हें रोक दिया क्योंकि वहां पहले से ही गंधर्वों के राज चित्रसेन जलक्रीडा करने अपने सेवकों और अप्सराओं के साथ आया हुआ था।

 

गंधर्वों ने दुर्योधन को बनाया था बंदी
दुर्योधन के कहने पर सैनिक सरोवर की सीमा में घुस गए और गंधर्वों को मारने लगे। गंधर्वों के स्वामी चित्रसेन को जब यह पता चला तो उसने मायास्त्र चलाकर कौरवों को भ्रम में डाल दिया। इससे कौरवों की सेना में भगदड़ मच गई। चित्रसेन ने दुर्योधन, दु:शासन आदि को बंदी बना लिया।
जो कौरव सैनिक गंधर्वों से जान बचाकर भागे, उन्होंने पांडवों को यह बात बताई। उनकी बात सुनकर युधिष्ठिर ने भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव से कहा कि तुम जाकर दुर्योधन आदि को छुड़ा कर लाओ। युधिष्ठिर के कहने पर चारों पांडव गंधर्वों के पास गए और दुर्योधन को छोड़ने के लिए कहा। गंधर्व नहीं माने तो भीम, अर्जुन, नकुल व सहदेव ने उन पर हमला कर दिया।

 

इसलिए आत्महत्या करना चाहता था दुर्योधन
अर्जुन ने आग्नेयास्त्र छोड़कर हजारों गंधर्वों को मार दिया। गंधर्वों को हारता देख गंधर्वराज चित्रसेन ने दुर्योधन आदि को छोड़ दिया। गंधर्वों के बंधन से मुक्त हुए दुर्योधन से धर्मराज युधिष्ठिर हस्तिनापुर जाने के लिए कहते हैं। इस तरह अपमानित होकर दुर्योधन अपने नगर की ओर चला गया। दुर्योधन को उस समय अत्यंत ग्लानि का अनुभव हो रहा था।
अपमान से दु:खी होकर दुर्योधन आत्महत्या करने के बारे में सोचता है। कर्ण, दु:शासन, शकुनि आदि दुर्योधन को बहुत समझाते हैं लेकिन वह नहीं मानता। दुर्योधन अंतिम निश्चय कर साधुओं के वस्त्र धारण कर लेता है। अन्न-जल त्याग कर उपवास के नियमों का पालन करने लगता है।

किसने रोका दुर्योधन को आत्महत्या करने से
दुर्योधन आत्महत्या करना चाहता है, यह बात जब देवताओं से पराजित पातालवासी दैत्यों को पता चलती है तो वह सोचते हैं कि अगर दुर्योधन का अंत हो गया तो हमारा पक्ष कमजोर हो जाएगा। यह सोचकर पातालवासी दैत्य एक यज्ञ करते हैं, उस यज्ञकुंड से एक कृत्या (राक्षसी) प्रकट होती है। दैत्य उस कृत्या से दुर्योधन को पाताल लाने के लिए कहते हैं।
दैत्यों की आज्ञा से कृत्या दुर्योधन के शरीर में प्रवेश कर कुछ ही देर में उसे पाताल ले आती है। तब पातालवासी दैत्यों ने दुर्योधन को समझाया कि जो पुरुष आत्महत्या करते हैं, उनकी सभी ओर निंदा होती है और वह अधोगति को प्राप्त होता है। तुम्हारी सहायता के लिए अनेक दानव पृथ्वी पर उत्पन्न हो चुके हैं। इस प्रकार दुर्योधन को पूरी बात बताकर पातालवासी दैत्य उसे पुन: धरती पर भेज देते हैं। 

दुर्योधन ने की ये प्रतिज्ञा
जब दुर्योधन पुन: धरती पर आता है तो उसे यह पूरी घटना एक सपने जैसी लगती है। दूसरे दिन कर्ण दुर्योधन के सामने प्रतिज्ञा करता है कि अज्ञातवास समाप्त होते ही वह पांडवों का विनाश कर देगा।
इस प्रकार कर्ण के कहने पर और दैत्यों की बात याद कर दुर्योधन आत्महत्या करने का विचार छोड़ देता है और पांडवों से युद्ध करने का पक्का विचार कर अपनी सेना के साथ हस्तिनापुर लौट आता है।