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​ग्रंथों सेः गंधर्व विवाह को ही कहते हैं लव मैरिज, ये हैं रोचक बातें

लड़की का विवाह करते समय माता-पिता को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, इसके बारे में महाभारत में बताया गया है।

Dainik Bhaskar

Dec 14, 2017, 05:00 PM IST
mahabharat- know the interesting things about marriage.

विवाह हिंदू धर्म की परंपराओं में से एक है। लड़की का विवाह करते समय माता-पिता को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए या समय पर विवाह न होने की स्थिति में कन्या को क्या करना चाहिए आदि गुप्त बातों के विषय में भीष्म पितामाह ने युधिष्ठिर को काफी विस्तार से समझाया है, इसका वर्णन महाभारत के अनुशासन पर्व में मिलता है। इसकी जानकारी इस प्रकार है-


1. महाभारत के अनुसार, कन्या के पिता को सबसे पहले वर के स्वभाव, आचरण, विद्या, कुल-मर्यादा और कार्यों की जांच करना चाहिए। यदि वह इन सभी बातों से सुयोग्य प्रतीत हो तो उसे कन्या देना चाहिए अन्यथा नहीं। इस प्रकार योग्य वर को बुलाकर उसके साथ कन्या का विवाह करना उत्तम ब्राह्मणों का धर्म ब्राह्म विवाह है।
2. अपने माता-पिता के द्वारा पसंद किए गए वर को छोड़कर कन्या जिसे पसंद करती हो तथा जो कन्या को चाहता हो, ऐसे वर के साथ कन्या का विवाह करना गंधर्व विवाह (लव मैरिज) कहा गया है।
3. जो दहेज आदि के द्वारा वर को अनुकूल करके कन्यादान किया जाता है, यह श्रेष्ठ क्षत्रियों का सनातन धर्म-क्षात्र विवाह कहलाता है। कन्या के बंधु-बांधवों को लोभ में डालकर बहुत सा धन देकर जो कन्या को खरीद लिया जाता है, इसे असुरों का धर्म(आसुर विवाह) कहते हैं।

नोट- ये खबर केवल पाठकों का शास्त्र संबंधी ज्ञान बढ़ाने के लिए है। वर्तमान समय के लिए ये खबर प्रासंगिक नहीं है।
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4. कन्या के माता-पिता व अन्य परिजनों को मारकर रोती हुई कन्या के साथ जबर्दस्ती विवाह करना राक्षस विवाह करना कहलाता है। महाभारत के अनुसार ब्राह्म, क्षात्र, गांधर्व, आसुर और राक्षस विवाहों में से पूर्व के तीन विवाह धर्मा के अनसुार हैं और शेष दो पापमय हैं। आसुर और राक्षस विवाह कदापि नहीं करने चाहिए।
5. माता-पिता ऋतुमती होने के पहले कन्या का विवाह न करें तो ऋतुमती होने के पश्चात तीन वर्ष तक कन्या अपना विवाह होने का इंतजार करना चाहिए, चौथा वर्ष लगने पर स्वयं ही किसी को अपना पति बना ले। ऐसा करने से वह कन्या निंदा करने योग्य नहीं मानी जाएगी।

 

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6. महाभारत के अनुसार अयोग्य वर को कन्या नहीं देनी चाहिए क्योंकि सुयोग्य पुरुष को कन्यादान करना ही काम संबंधी सुख तथा सुयोग्य संतान की उत्पत्ति का कारण है। कन्या के क्रय-विक्रय में बहुत तरह के दोष हैं, केवल कीमत देने या लेने से ही कोई कन्या किसी की पत्नी नहीं हो सकती।
7. कन्या का दान ही सर्वश्रेष्ठ है, खरीदकर या जीतकर लाना नहीं। कन्यादान ही विवाह कहलाता है। जो लोग कीमत देकर खरीदने या बलपूर्वक हर लाने को ही पतीत्व का कारण मानते हैं, वे धर्म को नहीं जानते। खरीदने वालों को कन्या नहीं देनी चाहिए तथा जो बेची जा रही हो, ऐसी कन्या से विवाह नहीं करना चाहिए क्योंकि पत्नी खरीदने-बेचने की वस्तु नहीं है।

 

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8. कन्या का पाणिग्रहण होने से पहले का वैवाहिक मंगलाचार (सगाई, टीका आदि) हो जाने पर भी यदि दूसरे सुयोग्य वर को कन्या दे दी जाए तो पिता को केवल झूठ बोलने का पाप लगता है (पाणिग्रहण से पूर्व कन्या विवाहित नहीं मानी जाती)
9. सप्तपदी के सांतवे पद में वैवाहिक मंत्रों की समाप्ति होती है अर्थात सप्तपदी की विधि पूर्ण होने पर ही कन्या में पत्नीत्व की सिद्धि होती है। जिस पुरुष को जल से संकल्प करके कन्या दी जाती है, वही उसका पाणिग्रहीता पति होता है और उसी के वह पत्नी कहलाती है। इस प्रकार विद्वानों ने कन्यादान की विधि बतलाई है।
10. जो कन्या माता की सपिण्ड (माता के परिवार से) और पिता के गोत्र की न हो, उसी के साथ विवाह करना श्रेष्ठ माना गया है।

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