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किसके रथ पर बैठकर किया था श्रीराम ने युद्ध, जिसके कारण मिली थी जीत

रामयण के 4 अनजाने किस्से

Danik Bhaskar | Jan 14, 2018, 05:00 PM IST

रामायण एक ऐसा ग्रंथ है, जिसके बारे में हर छोटी-बड़ी बात भगवान श्रीराम के भक्त जानना चाहते हैं। रामयण के कई किस्से तो लगभग हर किसी को पता ही है, लेकिन इस ग्रंथ की कुछ ऐसी बातें भी हैं, जो बहुत ही कम लोग जानते होंगे।

इन कहानियों में रामायण काल के कुछ रहस्य और खास बातें शामिल है। आज हम आपको रामायण से जुड़ी 4 ऐसी ही बातें के बारे में बताने जा रहे हैं, जो भगवान श्रीराम के हर भक्त को पता होनी चाहिए-

युद्ध के लिए भगवान इन्द्र ने दिया था श्रीराम को अपना रथ

रावण और भगवान श्रीराम की सेना के बीच घोर युद्ध चल रहा था। भगवान श्रीराम की सेना ने रावण के पक्ष के सभी वीर योद्धाओं का नाश कर दिया था। अपने पक्ष के सभी योद्धाओं का वध हो जाने पर भगवान श्रीराम से युद्ध करने के लिए खुद रावण युद्धभूमि में आया। भगवान श्रीराम धरती पर खड़े होकर युद्ध कर रहे थे और रावण रथ पर खड़ा था।

यह देखकर भगवान इन्द्र ने अपना दिव्य रथ अपने रथ के सारथी मातलि के साथ भगवान राम के प्रदान किया। भगवान इंद्र के भेजे रथ पर चढ़कर ही प्रभु श्रीराम ने रावण के साथ युद्ध किया। उस रथ पर चढ़ने के बाद भगवान श्रीराम और रावण के बीच घोर युद्ध हुआ और अतः में भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर दिया।

आगे जानें रामायण के ऐसे ही 3 और किस्सें...

देवताओं के इस छल की वजह से श्रीराम को जाना पड़ा था वनवास

 

 

लंका के राजा रावण और वहां के कई राक्षसों का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में जन्म लिया था। भगवान राम के राज्याभिषेक की तैयारियां चल रही थीं। अगर श्रीराम का राजा के पद पर अभिषेक हो जाता, तो उनके जन्म के पीछे का मुख्य उद्देश्य अधूरा रह जाता। इसी बात से सभी देवता बहुत परेशान थे। अपनी परेशानी का हल निकालने के लिए सभी देवता देवी सरस्वती के पास गए और उनसे रानी कैकेयी की दासी मन्थरा की बुद्धि फेरने की प्रार्थना की। ताकि वह रानी कैकेयी को भड़का कर श्रीराम के लिए वनवास जाने का वर मांगे। देवी सरस्वती ने ऐसा ही किया। जिसके फलस्वरूप श्रीराम को चौदह वर्ष के लिए वनवास जाना पड़ा। वहां रहकर उन्होंने सभी राक्षसों का वध कर दिया।

राक्षसकुल में उत्पन्न होने पर भी विभीषण क्यों दिया था श्रीराम का साथ

 

 

रावण, कुंभकर्ण और विभीषण ब्रह्मा जी को खुश करके उनसे वरदान प्राप्त करना चाहते थे। वरदान पाने की इच्छा से वे तीनों ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या करने लगे। तपस्या से खुश होकर भगवान ब्रह्मा ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। ब्रह्मा जी के ऐसा करने पर रावण के मनुष्य के हाथों अपनी मृत्यु होने का और कुंभकर्ण ने अधिक समय कर नींद लेना का वर मांगा। जब ब्रह्मा जी ने विभीषण को वरदान मांगने को कहा, तब उसने किसी भी समय अपने मन में पाप का विचार ना उठने और अपना मन सदैव ही देव भक्ति में लगे रहने का वरदान मांगा था। इसी वरदान की वजह से राक्षसकुल में उत्पन्न होने पर भी विभीषण ने युद्ध में श्रीराम का साथ दिया था।

भरत ने अपने बाण से हनुमान को क्यों घायल कर दिया था

 

 

श्रीरामचरितमानस के लंकाकाण्ड के अनुसार, लक्ष्मण और मेघनाथ के बीच भीषण युद्ध चल रहा था। मेघनाथ के वार से लक्ष्मण बेहोश होकर धरती पर गिर पड़े। लक्ष्मण को स्वस्थ करने के लिए हनुमान संजीवनी बूटी लाने के लिए पर्वत पर गए। उस पर्वत पर कई औषधियां होने के कारण हनुमान संजीवनी बूटी पहचान न सके और पर्वत ही उखाड़ कर ले जाने लगे। हनुमान उड़ते हुए अयोध्या के ऊपर पहुंच गए। आकाश में हनुमान का विशाल रूप देखकर भरत ने उसे राक्षस समझा और उन्हें तीर मार दिया। भरत के उस तीर से घायल हनुमान धरती पर गिर पड़े। हनुमान के पास जाने पर भरत ने हनुमान को राम भक्त जानकर उन्हें ठीक कर दिया।