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द्रौपदी के जन्म और विवाह से जुड़े कुछ ऐसे रहस्य, जो बहुत ही कम लोग जानते होंगे

पीछले जन्म की एक गलती के चलते पांच पांडवों की पत्नी बनी थी द्रौपदी

Dainik Bhaskar

Feb 16, 2018, 05:00 PM IST
unknown facts about draupadi from mahabharat

द्रौपदी महाभारत के सबसे अहम पात्रों में से एक थी। द्रौपदी को स्वयंवर में अर्जुन ने अपने पराक्रम से प्राप्त किया था, फिर भी वह पांचों भाइयों (पांडवों) की पत्नी बनी। आखिर क्यों द्रौपदी को पांच पांडवों की पत्नी बनना पड़ा, क्या था इस बात का कारण, ये सवाल लगभग हर किसी के मन में आता ही होगा। इस बात का जवाब महाभारत में ही मौजूद है। द्रौपदी के पिछले जन्म में भगवान शिव ने उसे एक वरदान दिया था, जिसके चलते द्रौपदी के साथ ऐसा हुआ।

महाभारत के आदिपर्व में इस कथा का वर्णन किया है। उसके अनुसार-

द्रौपदी पूर्व जन्म में महात्मा ऋषि की कन्या थी। रूपवती, गुणवती और सदाचारिणी होने पर भी पूर्वजन्मों के कर्मों के फलस्वरूप किसी ने उसे पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं किया। इससे दु:खी होकर वह तपस्या करने लगी। भगवान शंकर उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए तथा वरदान मांगने को कहा। ऋषि पुत्री ने पांच बार कहा- मैं सर्वगुणयुक्त पति चाहती हूं।


भगवान शिव ने कहा- तुझे पांच भरतवंशी पति प्राप्त होंगे। ऋषि कन्या बोली- मैंने तो एक ही पति का कामना की थी। भगवान शंकर ने कहा- तुमने पति प्राप्त करने के लिए मुझसे पांच बार प्रार्थना की इसीलिए अगले जन्म में तुझे पांच ही पति प्राप्त होंगे। भगवान शंकर के इसी वरदान के रूप में द्रौपदी पांडवों की पत्नी बनी।

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अग्नि से प्रकट होकर जन्मी थी द्रौपदी-

 

महाभारत के अनुसार, एक बार राजा द्रुपद पांडवों से पराजित होने के कारण परेशान थे। जब से द्रोणाचार्य के कारण युद्ध में उनकी हार हुई, उन्हें एक पल भी चैन नहीं था। राजा द्रुपद चिंता के कारण कमजोर हो गए। वे द्रोणाचार्य को मारने वाले पुत्र की चाह में एक आश्रम से दूसरे आश्रम भटकने लगे। ऐसे ही भटकते हुए वे एक बार कल्माषी नाम के नगर में पहुंचे। उस नगर में ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले ब्राह्मण रहते थे। वहीं, उन्हें दो ब्राह्मण याज और उपयाज मिले। उन्होंने पहले छोटे भाई उपयाज से अपने लिए पुत्र प्राप्ति हवन करने के लिए प्रार्थना की। फिर उपयाज के कहने पर उन्होंने याज से प्रार्थना की। उसके बाद याज ने राजा द्रुपद के यहां पुत्र प्राप्ति के लिए हवन करवाया।

 


उस अग्निकुंड से एक दिव्य कुमार प्रकट हुआ। वह कुमार अग्निकुंड से निकलते ही गर्जना करने लगा। वह रथ पर बैठकर इधर-उधर घूमने लगा। उसी वेदी यानी हवनकुंड से कुमारी पांचाली यानि द्रौपदी का भी जन्म हुआ। जन्म के समय द्रौपदी का रूप ऐसा था मानों कोई देवांगना मनुष्य शरीर धारण करके सामने आ गई हो।

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