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2 किस्से: सिर्फ अपने भक्तों का ही नहीं, कई राक्षसों का भी उद्धार किया था श्रीकृष्ण ने

दो किस्से जो बताते हैं कितने दयालु हैं भगवान श्रीकृष्ण

Dainik Bhaskar

Feb 17, 2018, 05:00 PM IST
Demons Killed by Krishna, How Lord Krishna Killed various Demon

भगवान कृष्ण में अपने पूरे जीवन में कई लीलाएं और चमत्कार किए है। राक्षसों का वध, अपने भक्तों का उद्धार और कई लोगों को उनके श्राप से मुक्ति भी दिलाई थी। श्रीगर्ग-संहिता में ऐसे कई राक्षसों के बारे में बताया है, जो किसी न किसी श्राप की वजह से मनुष्य यौनी छोड़कर राक्षस प्रवृत्ति के हो गए थे। जिन्हें उनके श्राप से मुक्ति और किसी ने नहीं बल्कि भगवान कृष्ण ने दिलाई थी।

बैलरूपी वत्सासुर का वध करके उसे किया था श्राप से मुक्त

श्रीगर्ग-संहिता के अनुसार, एक बार भगवान कृष्ण गाय-बछड़ों को चराने के लिए जंगल में कई थे। वहीं पर वत्सासुर नाम का राक्षस श्रीकृष्ण के बछड़ों के झुंड में आकर मिल गया और उनकी गाय-बछड़ों को मारने लगा। भगवान कृष्ण ये बात जान चुके थे। जब वत्सासुर ने भगवान कृष्ण के कंछे पर प्रहार किया, तब भगवान ने उसे धरती पर पटक कर उसका वध कर दिया। धरती पर गिरती ही वत्सासुर राक्षस यौनी को छोड़ मनुष्यरूप में आ गया। भगवान के हाथों उसका वध होने की वजह से स्वर्ग की प्राप्ति हुई।

किसने दिया था वत्सासुर को बैल हो जाने का श्राप

मान्यताओं के अनुसार, मुर नाम के दैत्य का एक पुत्र था, जिसका नाम था प्रमील। एक दिन उसने वसिष्ठ मुनि के आश्रम में होमधेनु निन्दिनी को देखा और उसे पाने के लालच में उसने एक ब्राह्मण का रूप धारण कर लिया। ब्रह्माण का रूप धारण करके प्रमील ऋषि वसिष्ठ से नन्दिनी गाय को उसे दान करने की प्रार्थना करने लगा। नन्दिनी गाय प्रमील के मन की बात जान गई थी। अपने अपहरण की बात से क्रोधित होकर गाय ने उसे बैल बन जाने का श्राप दे दिया था। श्राप से मुक्ति पाने के लिए बैलरूपी प्रमील ऋषि वसिष्ठ से माफी मांगते हुए, इस श्राप से बचने का उपाय पूछने लगा। प्रमील के प्रार्थना करने पर द्वापर युग के अंत में भगवान कृष्ण के हाथों उसका उद्धार होने का वरदान दिया था।

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अघासुर का मस्तक फोड़कर श्रीकृष्ण ने की थी ग्वालों और गायों की रक्षा

 

 

एक दिन भगवान कृष्ण सभी ग्वालों और गायों के साथ कालिन्दी नदी के तक पर घूम रहें थे। उसी समय रास्ते में अघासुर नाम के सांपरूपी राक्षस आ गया। बालकों को आता देख, उसने अपना शरीर बहुत बड़ा बना लिया और अपना मुंह खोलकर रास्ते में खड़ा हो गया। दूर के वह विशाल पर्वत के समान दिखाई देने लगा। पर्वत समय कर सभी ग्वाल, गायों और भगवान कृष्ण ने उसके मुंह में प्रवेश कर लिया। ऐसा होने पर वह राक्षस सभी ग्वालों और गायों को निगल गया। तब सभी की रक्षा करने के लिए भगवान कृष्ण उस दैत्य का सिर फोड़कर बारह निकले और उस दैत्य का वध करके सभी की रक्षा की। श्रीकृष्ण के हाथों वध होने के कारण वह राक्षस तुरंत ही राक्षस यौनी छोड़कर मनुष्यरूप को प्राप्त हो गया और उसे स्वर्ग की प्राप्ति हुई।

 

 

अपमानित होने पर ऋषि अष्टावक्र ने दे दिया था अघासुर को साप बन जाने का श्राप

 

कहा जाता है कि शंखासुर का एक पुत्र था, जिसका नाम अघ था। अघ बहुत ही सुदंर था। अपनी सुंदरता पर उसे बहुत घमंड था। एक दिन अघ मलयाचल पर्वत पर जा रहा था। रास्ते में उसने ऋषि अष्टावक्र को देखा। ऋषि बहुत ही वृद्ध और कमजोर थे। अघ ने ऋषि की ऐसी अवस्था देखकर उनका मजाक उठाने लगा। इस बात से अपमानित होकर ऋषि ने अघ को सांप बन जाने का श्राप दे दिया। बाद में भगवान कृष्ण ने उसका वध करके उसे इस श्राप से मुक्त किया।

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