--Advertisement--

क्या आप जानते हैं भगवान शेषनाग के बारें में ये रोचक बातें?

शास्त्रों के अनुसार, शेषनाग के एक हजार फन हैं। इन्होंने ही पृथ्वी को अपने सिर पर धारण कर रखा है।

Danik Bhaskar | Nov 18, 2017, 05:00 PM IST

हिंदू धर्म में अनेक देवी-देवताओं की मान्यता है, लेकिन उनसे जुड़ी रोचक बातें बहुत ही कम लोग जानते हैं। आज हम आपको बता रहे हैं भगवान शेषनाग के बारे में। शास्त्रों के अनुसार, शेषनाग के एक हजार फन हैं। इन्होंने ही पृथ्वी को अपने सिर पर धारण कर रखा है। यह भगवान नारायण के अंशावतार हैं। भगवान नारायण शेषनाग पर ही शयन करते हैं। उनके लिए ये शय्या रूप हैं। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि शेषनाग महर्षि कश्यप और कद्रू के पुत्र हैं।

इसलिए कहते हैं शेष

शेष शब्द का मतलब है बचा हुआ। ऐसा कहते हैं कि जब सभी लोक नष्ट हो जाते हैं और पंच महाभूत महतत्व में लीन हो जाते हैं तब ये ही शेष रहते हैं। इसीलिए इनको शेष कहते हैं। श्रीमद्भागवत में भी इसका उल्लेख माता देवकी के माध्यम से किया गया है।

नष्टे लोके द्विपरार्धावसाने महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु।
व्यक्तेऽव्यक्तं कालवेगेन याते भवानेक: शिष्यते शेषसंज्ञ:॥ -10/3/25

अर्थ- जिस समय ब्रह्माण्ड की पूरी आयु समाप्त हो जाती है, काल की शक्ति के प्रभाव से समस्त लोक नष्ट हो जाते हैं, पंच महाभूत अहंकार में, अहंकार महतत्व में और महतत्व प्रकृति में लीन हो जाता है। तब एकमात्र भगवान ही शेष रह जाते हैं इसलिए उनका एक नाम शेष भी है।


भगवान शेषनाग के बारे में और अधिक जानने के लिए आगे की स्लाइड्स पर क्लिक करें-

तस्वीरों का इस्तेमाल प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

राजा चित्रकेतु को दिए थे दर्शन

शेष का स्वरूप बड़ा ही दिव्य है। राजा चित्रकेतु को इनके स्वरूप के दर्शन हुए थे। इनका शरीर गौरा है। ये नीले रंग के वस्त्र धारण करते हैं। ये मुकुट, बाजूबंद, करधनी जैसे आभूषण पहनते हैं।

मृणालगौरं शितिवाससं स्फुरत्किरीटकेयूरकटित्रकङ्कणम्।
प्रसन्नवक्त्रारुणलोचनं वृतं ददर्श सिद्धेश्वरमण्डलै: प्रभुम्॥
श्रीमद्भागवत-6/16/30

अर्थ- चित्रकेतु ने देखा कि भगवान शेष सिद्धेश्वरों के मंडल में विराजमान हैं। उनका शरीर कमलनाल के समान गौरवर्ण है। उन पर नीले रंग के वस्त्र हैं। सिर पर किरीट यानी मुकुट, बांहों में बाजूबंद, कमर में करधनी और कलाई में कंगन आदि आभूषण चमक रहे हैं। नेत्र रतनारे अर्थात लाल हैं और मुख पर प्रसन्नता छा रही है।

ये भी है शेषनाग का एक नाम

वाल्मीकि रामायण में शेषनाग को अनंतदेव कहा गया है। इस ग्रंथ के अनुसार भी शेष के एक हजार सिर हैं। वन में सुग्रीव ने वानरों को इनका स्वरूप बताया था-

तत्र चन्द्रप्रतीकाशं पन्नगं धरणीधरम्।
पद्मपत्रविशालाक्षं ततो द्रक्ष्यथ वानरा:॥
आसीनं पर्वतस्याग्रे सर्वदेवनमस्कृतम्।
सहस्त्रशिरसं देवमनन्तं सर्वदेवनमस्कृतम्॥
वाल्मीकि रामायण 4/40/51-52

अर्थ- उसके शिखर पर इस पृथ्वी को धारण करने वाले भगवान अनंत बैठे दिखाई देंगे। उनका यानी शेष का श्रीविग्रह चंद्रमा के समान गौरवर्ण का है। वे सर्प जाति के हैं लेकिन उनका स्वरूप देवताओं के समान है। उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान है। उनका शरीर नीले रंग के वस्त्रों से ढंका हुआ है। उन अनंतदेव के सहस्त्र अर्थात एक हजार मस्तक हैं।

बलराम के रूप में अवतार

श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम के रूप में शेष ने ही अवतार लिया था। वैसे तो बलराम देवकी के गर्भ में अवतरित हुए थे, लेकिन कंस से बचाने के लिए योगमाया ने देवकी के गर्भ को निकालकर रोहिणी के पेट में रख दिया था। इस तरह शेष का बलराम के रूप में अवतरण हुआ था।

बालकृष्ण की रक्षा

शेषनाग ने बालकृष्ण की रक्षा की थी। जब वसुदेव कारागार में जन्मे श्रीकृष्ण को  सिर पर रखकर गोकुल ले जा रहे थे तब अचानक वर्षा होने लगी तब शेषनाग ने अपना फन फैलाकर उनकी रक्षा की थी।