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कब और कैसे हुआ था श्रीराम-सीता का विवाह, ये है पूरा प्रसंग

धर्म ग्रंथों के अनुसार, अगहन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को भगवान श्रीराम व सीता का विवाह हुआ था।

Danik Bhaskar | Nov 21, 2017, 05:00 PM IST
धर्म ग्रंथों के अनुसार, अगहन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को भगवान श्रीराम व सीता का विवाह हुआ था। इसीलिए इस दिन विवाह पंचमी का पर्व बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस बार ये पर्व 23 नवंबर, गुरुवार को है। इस अवसर पर हम आपको बता रहे हैं श्रीरामचरित मानस के अनुसार, श्रीराम ने सीता को पहली कहां और कब देखा था तथा श्रीराम-सीता विवाह का संपूर्ण प्रसंग, जो इस प्रकार है-

यहां देखा था श्रीराम ने पहली बार सीता को

जब श्रीराम व लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ जनकपुरी पहुंचे तो राजा जनक सभी को आदरपूर्वक अपने साथ महल लेकर आए। अगले दिन सुबह दोनों भाई फूल लेने बगीचे गए। उसी समय राजा जनक की पुत्री सीता भी माता पार्वती की पूजा करने के लिए वहां आईं। सीता श्रीराम को देखकर मोहित हो गईं और एकटक निहारती रहीं।
माता पार्वती का पूजन करते समय सीता ने श्रीराम को पति रूप में पाने की कामना की। अगले दिन धनुष यज्ञ (जो भगवान शंकर के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, सीता का विवाह उसी के साथ होगा) का आयोजन किया गया। राजा जनक के बुलावे पर ऋषि विश्वामित्र व श्रीराम व लक्ष्मण भी उस धनुष यज्ञ को देखने के लिए गए।

श्रीराम विवाह का संपूर्ण वर्णन जानने के लिए आगे की स्लाइड्स पर क्लिक करें-

तस्वीरों का इस्तेमाल प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।


जब श्रीराम पहुंचे सीता स्वयंवर में

राजा जनक के निमंत्रण पर श्रीराम व लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ धनुष यज्ञ (सीता स्वयंवर) में गए। जो राक्षस राजा का वेष बनाकर उस सभा में बैठे थे, उन्हें श्रीराम के रूप में अपना काल नजर आया। तभी सेवकों ने राजा जनक के कहने पर भरी सभा में घोषणा की कि यहां जो शिवजी का धनुष रखा है, वह भारी और कठोर है। जो राजपुरुष इस धनुष को तोड़ेगा, वही जनककुमारी सीता का वरण करेगा। घोषणा सुनने के बाद अनेक वीर पराक्रमी राजाओं ने उस शिव धनुष को उठाने का प्रयास किया, लेकिन वे सफल नहीं हो पाए। 

जब श्रीराम ने तोड़ा शिव धनुष

तब राजा ऋषि विश्वामित्र के कहने पर श्रीराम उस शिव धनुष को तोड़ने के लिए चले। श्रीराम ने मन ही मन गुरु को प्रणाम किया और बड़ी फुर्ती से धनुष को उठा लिया और प्रत्यंचा बांधते समय वह टूट गया। यह देख राजा जनक, उनकी रानी व सीता के मन में हर्ष छा गया। सीता ने वरमाला श्रीराम के गले में डाल दी। यह दृश्य देख देवता भी प्रसन्न होकर फूल बरसाने लगे। उसी समय वहां परशुराम आ गए। जब उन्होंने अपने आराध्य देव शिव का धनुष टूटा देखा तो वे बहुत क्रोधित हो गए और राजा जनक ने पूछा कि ये किसने किया है मगर भय के कारण राजा जनक कुछ बोल नहीं पाए।

 

ऐसे दूर हुआ परशुराम के मन का संदेह

परशुराम का क्रोध देखकर लक्ष्मण उनका उपहास करने लगे। बात बढ़ती देख श्रीराम ने कुछ रहस्यपूर्ण बातें परशुराम से कहीं। परशुराम ने जब श्रीराम के रूप में भगवान विष्णु की छवि देखी तो अपने मन का संदेह मिटाने के लिए उन्होंने अपना विष्णु धनुष श्रीराम को देकर उसे खींचने के लिए कहा। तभी परशुराम ने देखा कि वह धनुष स्वयं श्रीराम के हाथों में चला गया। यह देख कर उनके मन का संदेह दूर हो गया और वे तप के लिए वन में चले गए। तब उन्होंने ऋषि विश्वामित्र के कहने पर राजा दशरथ को बुलावा भेजा और विवाह की तैयारियां करने लगे। 

ब्रह्माजी ने लिखी थी विवाह की लग्न पत्रिका

सूचना मिलते ही राजा दशरथ भरत, शत्रुघ्न व अपने मंत्रियों के साथ जनकपुरी आ गए। उस समय हेमंत ऋतु थी और अगहन का महीना था। ग्रह, तिथि, नक्षत्र योग आदि देखकर ब्रह्माजी ने उस पर विचार किया और वह लग्नपत्रिका नारदजी के हाथों राजा जनक को पहुंचाई। शुभ मुहूर्त में श्रीराम की बारात आ गई। श्रीराम व सीता का विवाह संपन्न होने पर राजा जनक और दशरथ बहुत प्रसन्न हुए। इसके बाद राजा जनक ने राजा दशरथ की सहमति से अपने छोटे भाई कुशध्वज की पुत्री मांडवी का विवाह भरत से, उर्मिला का विवाह लक्ष्मण व श्रुतकीर्ति का विवाह शत्रुघ्न से कर दिया।