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धर्मशास्त्र भविष्यपुराण और मनुस्मृति के अनुसार हर एक गृहस्थ को पंचमहायज्ञ करना जरूरी माना है। इस संबंध में मनुस्मृति में

Danik Bhaskar | Dec 12, 2017, 01:57 PM IST

धर्मशास्त्र भविष्यपुराण और मनुस्मृति के अनुसार हर एक गृहस्थ को पंचमहायज्ञ करना जरूरी माना है। इस संबंध में मनुस्मृति में कहा गया है

अध्यापनं ब्रह्मायज्ञ: पितृयज्ञस्तु तर्पणम्।
होमो दैवो बलिभौंतो नृयज्ञोतिथि पूजनम्।।

यानी पंच महायज्ञों में वेद पढ़ना ब्रह्मा यज्ञ, तर्पण पितृ यज्ञ, हवन देव यज्ञ, पंचबलि भूत यज्ञ और अतिथियों का पूजन सत्कार अतिथि यज्ञ कहा जाता है।

ब्रह्राा यज्ञ- ब्रह्राा यज्ञ का अर्थ है वेदों व धर्म ग्रंथों का अध्ययन और उन्हें दूसरों पढ़ना यानी अध्यापन। इनके नियमित अभ्यास से जहां बुद्धि बढ़ती है। वहीं पवित्र विचार भी मन में स्थिर होती है। इसलिए रोजाना धार्मिक ग्रंथों को पढ़ना या पढ़ाना चाहिए।

पितृ यज्ञ- पितृ यज्ञ का अर्थ है तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध हैं। कहा गया है कि पितृों को दिए गए अन्न व जल से वे खुश हो जाते हैं। तर्पण करने से पितृ लंबी आयु, संतान, धन, स्वर्ग, मोक्ष व अखंड राज्य का अशीर्वाद देते हैं।

देव यज्ञ- देव यज्ञ से तात्पर्य देवताओं व पूजन में हवन से हैं। सभी विघ्नों को दूर करने वाले, कष्टों को हरने वाले देव ही हैं। इसलिए हर घर में देवी-देवताओं का नियमित पूजन व हवन होना चाहिए।

पंच भूत यज्ञ- भूत यज्ञ से तात्पर्य है अपने अन्न में से कुछ भाग दूसरे जीवों के कल्याण के लिए देना। मनुस्मृति में कहा गया है कि कुत्ता, चांडाल, गरीब, कुष्ट रोगियों आदि के लिए भोजन अलग साफ जगह पर निकालकर फिर उसका दान कर देना चाहिए।

अतिथि यज्ञ- अतिथि यज्ञ से तात्पर्य है उनकी प्रेम आदर व सत्कार से सेवा करना । अतिथि को पहले भोजन करवाकर ही गृहस्थ को भोजन करवाना चाहिए। यही अतिथि यज्ञ है।