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अगर आप सफल होना चाहते हैं तो न करें ये 1 काम, हनुमानजी से सीखें कैसे मिलता है लक्ष्य

हनुमान जयंती पर जानिए हनुमानजी से कौन-कौन सी बातें सीख सकते हैं।

Dainik Bhaskar

Mar 29, 2018, 11:29 AM IST
Life management tips in hindi. shriram charit manas and tips in hindi, hanuman jayanti

यूटिलिटी डेस्क. शनिवार, 31 मार्च 2018 को हनुमान जयंती है। इस अवसर यहां जानिए श्रीरामचरित मानस के सुंदरकांड के अनुसार हम हनुमानजी से कौन-कौन सी बातें सीख सकते हैं, जिनसे हम भी सफल हो सके।

सुंदरकांड है हनुमानजी को समर्पित

श्रीरामचरित मानस का सुंदरकांड हनुमानजी को समर्पित है। इस कांड में हनुमानजी का पूरा पराक्रम प्रदर्शित किया गया है। इस अध्याय में हनुमानजी ने बल और बुद्धि का उपयोग करते हुए माता सीता की खोज की थी। माना जाता है कि ये उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण काम था, जिसकी वजह से वे श्रीराम के बहुत प्रिय हो गए। माता सीता ने भी उन्हें अमरता का वरदान इसी अध्याय में दिया था।


जब तक लक्ष्य न मिले ध्यान रखें ये बातें
अभ्यास कीजिए, लगातार अपने लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ने का। जब तक मंजिल ना मिल जाए, विश्राम ना करें। अपने स्वभाव में इस व्यवहारिक गुण को बैठा लें।
हनुमानजी से सीखिए, कैसे लक्ष्य तक बिना रुके पहुंचा जाए। श्रीरामचरित मानस के सुंदरकांड में जामवंत से प्रेरित हनुमान पूरे वेग से समुद्र लांघने के लिए चल पड़ते हैं।
समुद्र के दूसरे छोर पर रावण की नगरी लंका है, जहां हनुमानजी को पहुंचना है। लक्ष्य बहुत मुश्किल था और समय भी कम था। हनुमान तेजी से आकाश में उड़ रहे थे। तभी समुद्र ने सोचा कि हनुमान बहुत लंबी यात्रा पर निकले हैं, थक गए होंगे, उसने अपने भीतर रह रहे मैनाक पर्वत से कहा कि तुम हनुमान को विश्राम दो।
मैनाक पर्वत तुरंत उठा, उसने हनुमानजी से कहा कि आप थक गए होंगे, थोड़ी देर मुझ पर विश्राम करें और मुझ पर लगे पेड़ों से स्वादिष्ट फल खा लो।
हनुमानजी ने मैनाक के निमंत्रण का मान रखते हुए सिर्फ उसे छूभर लिया और कहा कि राम काज किन्हें बिना मोहि कहां विश्राम। रामजी का काम किए बगैर मैं विश्राम नहीं कर सकता। मैनाक का मान भी रह गया। हनुमान आगे चल दिए। रुके नहीं, लक्ष्य नहीं भूले।
हमें भी हनुमानजी की ये बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए। जब तक लक्ष्य न मिल जाए, तब तक विश्राम नहीं करना चाहिए।
विपरीत परिस्थितियों में कैसे बढ़ें आगे
अगर आप विपरीत परिस्थितियों में भी आगे बढ़ना चाहते हैं तो बल और बुद्धि दोनों से काम लेना आना चाहिए। जहां बुद्धि से काम चल जाए वहां बल का उपयोग नहीं करना।
श्रीरामचरित मानस का सुंदरकांड देखिए, प्रसंग है सीता की खोज में समुद्र लांघ रहे हनुमान को बीच रास्ते में सुरसा नाम की नागमाता ने रोक लिया। उनको खाने की जिद की। हनुमान ने बहुत मनाया, नहीं माना। वचन भी दे दिया, राम का काम करके आने दो, सीता का संदेश प्रभु को सुना दूं फिर खुद ही आकर आपका आहार बन जाऊंगा। लेकिन सुरसा नहीं मानी। वो खाने की जिद पर अड़ी रही लेकिन हनुमान पर कोई आक्रमण नहीं किया। ये बात हनुमान ने समझ ली, कि मामला मुझे खाने का नहीं है, सिर्फ ईगो की समस्या है।
तत्काल सुरसा के बड़े स्वरुप के आगे उन्होंने खुद को बहुत छोटा कर लिया। उसके मुंह में से घूम कर निकल आए। जहां मामला ईगो के सेटिस्फेक्शन का हो, वहां बल नहीं, बुद्धि का इस्तेमाल करना चाहिए, ये सिखाया। बड़े लक्ष्य को पाने के लिए अगर कहीं झुकना भी पड़े, झुक जाइए। सुरसा खुश हो गई। आशीर्वाद दिया। लंका का मार्ग प्रशस्त कर दिया।
जब हो समय का अभाव तो ध्यान रखें ये बातें
जब हनुमानजी लंका के द्वार पर पहुंचे, वहां लंकिनी नाम की राक्षसी मिली। रात के समय हनुमान छोटा रुप लेकर लंका में प्रवेश कर रहे थे, लंकिनी ने रोक लिया। यहां परिस्थिति दूसरी थी, लंका में रात के समय ही चुपके से घुसा जा सकता था। समय कम था, हनुमान ने लंकिनी से कोई वाद-विवाद नहीं किया। सीधे ही उस पर प्रहार कर दिया। लंकिनी ने रास्ता छोड़ दिया।
जब मंजिल के करीब हों, समय का अभाव हो और परिस्थितियों की मांग हो तो बल का प्रयोग अनुचित नहीं है। हनुमान ने एक ही रास्ते में आने वाली दो समस्याओं को अलग-अलग तरीके से निपटाया। जहां झुकना था वहां झुके, जहां बल का प्रयोग करना था, वहां वो भी किया। सफलता का पहला सूत्र ही ये है कि बल और बुद्धि का हमेशा संतुलन होना चाहिए। दोनों में से एक ही हो तो फिर सफलता दूर रहेगी।

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