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मकर संक्रांति पर जानें कोणार्क सूर्य मंदिर की 9 बातें, जो इसे बनाती है सबसे खास / मकर संक्रांति पर जानें कोणार्क सूर्य मंदिर की 9 बातें, जो इसे बनाती है सबसे खास

यूटीलिटी डेस्क

Jan 13, 2018, 05:00 PM IST

ये है कलियुग के एकमात्र साक्षात देवता का मंदिर, जानें यहां के रहस्य और बातें

facts about sun temple of konark

आज यानि 14 जनवरी को मकर संक्राति का पर्व है. ये पर्व भगवान सूर्य से संबंधित है। इसी खास मौके पर आज हम आपको बताने जा रहे हैं, भगवान सूर्य के सबसे खास मंदिर के बारे में..

मंदिर भगवान का घर होते हैं। मंदिर में स्थापित मूर्ति को ही भगवान का रूप मान कर भक्त पूरी श्रद्धा से पूजा और दर्शन करते हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कलियुग के साक्षात देवता के एक अनोखे और खास मंदिर के बारे में।

कहां है ये मंदिर-

यह मंदिर भारत के पूर्वी राज्य उड़ीसा के पुरी जिले में 21 मील उत्तरर पूर्व की ओर चंद्रभागा नदी के किनारे कोणार्क में स्थित है। इसे कोणार्क का मंदिर या कोणार्क का सूर्य मंदिर कहा जाता है।

विश्व धरोहरों में है शामिल-

भारत के इस प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर को यूनेस्को ने विश्व-धरोहर के रूप में भी शामिल किया है। यह मंदिर बेहद खूबसूरत होने के साथ-साथ वास्तु शास्त्र की नजर से भी बहुत खास है।

ऐसी है मंदिर की बनावट-

लाल बलुआ पत्थर और काले ग्रेनाइट पत्थर से 1236– 1264 ई.पू. में गंग वंश के राजा नृसिंहदेव द्वारा बनवाया गए इस मंदिर की पूरी दुनिया में चर्चा होती है। इस मंदिर की कल्पना सूर्य के रथ के रूप में की गई है। रथ में बारह जोड़े विशाल पहिए लगे हैं और इसे सात शक्तिशाली घोड़े तेजी से खींच रहे हैं।

यह भारत का एकमात्र भव्य सूर्य मंदिर है। चूंकि सूर्य स्वयं साक्षात देव हैं, जिनके बिना इस सृष्टि का संचालन नहीं हो सकता, इसलिए इस मंदिर में स्थापित भगवान के हम साक्षात दर्शन करते हैं।

मंदिर में मौजूद है सूर्य देव की ती प्रतिमाएं-

इस मंदिर में सूर्य भगवान की तीन प्रतिमाएं हैं, बाल्यावस्था-उदित सूर्य- जिसकी ऊंचाई 8 फीट है, युवावस्था जिसे मध्याह्न सूर्य कहा जाता है, इसकी ऊंचाई 9.5 फीट है, जबकि तीसरी अवस्था है प्रौढ़ावस्था, जिसे अस्त सूर्य भी कहा जाता है, जिसकी ऊंचाई 3.5 फीट है।

श्रीकृष्ण के पुत्र से जुड़ी मंदिर की एक कहानी-

इस मंदिर की एक कहानी भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ती है। कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को उनके श्राप से कोढ़ रोग हो गया था। साम्ब ने मित्रवन में चंद्रभागा नदी के सागर संगम पर कोणार्क में, बारह वर्ष तपस्या की और सूर्य देव को प्रसन्न किया। सूर्यदेव जो सभी रोगों के नाशक थे, ने इसका रोग भी अन्त किया। उनके सम्मान में, साम्ब ने एक मंदिर निर्माण का निश्चय किया।

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