आजकल वाले का तो पता नहीं, लेकिन पुराने जमाने में कस्बे-देहात में किए जाने वाले लव सच में किसी जेहाद से कम नहीं थे। भले ही दोनों की जाति एक हो, जेहाद तब भी था। तब इश्क के सिलसिले का सेट-सा पैटर्न था। शुरुआत में चार-छह टन कागज लगते थे। छह सौ ग्राम शब्दों के लिए तीन से चार किलो हिम्मत लगती थी। हिम्मत की मात्रा ज्यादा इसलिए रखी गई है कि सुताई का कॉन्सेप्ट ‘टू-वे’ था। यानी उधर से बच भी गए तो घर में पता चल जाने पर पराया माल मानकर मस्त धुलाई की जाती थी। इश्क को पूरी तरह झाड़ देने पर पर्याप्त जोर रहता था। पूरे शहर में फैले जासूसों के माध्यम से दोनों पक्षों में से किसी ना किसी को पता चल ही जाता था कि ‘लाडो’ या ‘बबलू’ किन मास्साब के यहां ट्यूशन पढ़ रहे हैं। ट्यूशन का समय और कोडवर्ड्स क्या हैं। घटनास्थल की दूरी कितनी है। आज का ‘चैप्टर’ क्या है? कमीने दोस्तों और बहकाने वाली सहेलियों की संख्या कितनी है। इस कारण संबंधित प्रेम पिपासु को कमांडो किस्म का चौकन्नापन और जुझारू व्यक्तित्व लगता था। कमांडो किस्म की फुर्ती इसलिए, क्योंकि कई बार किसी भी पक्ष का योद्धा 20 मिनट के शॉर्ट नोटिस पर ही घटनास्थल पर उपस्थित हो जाता था। ऐसी भीषण घड़ी में तत्काल निर्णय और उससे भी सपाटे से अमल ही बचाव का एकमात्र जरिया होता था। रंगे हाथों पकड़े जाने पर फिर सारी ट्यूशनें घर में ही लगाई जाती थीं। निकटतम दोस्त अधिकतम दूरी तय करके हर उपलब्ध कान को इस दु:खद घटना की सूचना पहुंचाता था।
इश्क का ‘द एंड’ हो जाता था। लड़की के घर से बाहर जाने की स्थिति में भाई-मां की गार्ड साथ चलती थी। ‘क्या कर डाला..!’ अर्थात लव लेटर टाइप की गतिविधियों के बारे में भारी पूछताछ चलती थी। इस गोपनीय जांच का उजागर नतीजा हमेशा यही निकलता था कि ‘अपनी छोकरी तो गऊ है, सहेलियों ने बिगाड़ दिया।’ किसी भी सरकारी जांच कमीशन से तेज रिजल्ट लाने वाले इस कमीशन की जांच रिपोर्ट के बारे में छोकरी को छोड़कर हर आदमी को पर्याप्त डिटेल से अवगत कराया जाता था। ‘लड़की जात है’ कि अपील के साथ जांच के परिणामों की गोपनीयता बरकरार रखने का निवेदन किया जाता था। यही अपील और उम्मीद वो भी आगे वाले से लगाता था, जिसका निष्कर्ष पूरे शहर को जानकारी के रूप में सामने आता था। प्रेम में गिफ्ट देने में भी कई खतरे छुपे होते थे। कई बार जिस स्टोर से वो गिफ्ट खरीदा गया है, वहां का मालिक ही पिताजी का दोस्त या भाई साहब का क्लासमेट निकल आता था। जो उस खुदरा वस्तु के खरीदार की पहचान उजागर करने का महान कार्य संपन्न करता था। बता भी जाता था कि परसों फलां के साथ साइकिल पर बैठी दिखी थी, हमने तो बस्ते से पहचान लिया था, संभाल लो..! आड़े वक्त पर जिस सहेली के मत्थे इस गिफ्ट की जिम्मेदारी मढ़ी जाती थी, वो घरवालों की हिटलिस्ट में आकर तत्काल ही ब्लैकलिस्ट हो जाती थी।
इस जेहाद का अंतिम परिणाम लड़की की शादी के रूप में सामने आता था, जिसके क्लाइमेक्स में उसके दहेज का सोफासेट बस में चढ़ाते समय बदला लेने की कसमें खाई जाती थीं, जो बाद में खुद भी शादी को प्राप्त हो जाने के कारण दिल में ही रह जाती थीं..!
अनुज खरे