पहले ही बड़ा जिद्दी बच्चा है वह।
और आज तो ऐसे जिद करके बैठा है कि मानने को राजी ही नहीं। रूठा-रूठा चेहरा। सबसे नाराज। फट पड़ने को तत्पर। पहले भी, बाप कुछ कहे तो जमीन पर लोट जाता रहा है। इतनी बार, इतनी छोटी-छोटी जिदों पर जमीन पर लेटा है कि अब उसकी इस हरकत पर कोई ध्यान ही नहीं देता। पर ध्यान दो तो वह और रूठ जाता है। कहता है कि अब मैं नहीं उठने वाला।
आज भी ऐसा ही रूठा बैठा है। आज क्या जिद है, यह स्वयं भी ठीक से नहीं बता सकता वह। वैसे भी दस तरह की जिदें रहती हैं उसकी। ‘मुझे गोदी में उठाकर छत से कूदो’, ‘मुझे वह वाला सितारा आसमान से नोचकर दो’, ‘अपना पेट फाड़कर दिखाओ कि तुम सच कह रहे हो’ - ऐसी बातें। बाप समझाता है कि तू ऐसी फालतू जिदें किया कर। पर अभी भी यही हुआ। बाप मनाता रहा। बच्चा अड़ा रहा। अंतत: बाप ने लतिया दिया तो वह जमीन पर लोट गया। फिर कोने में जाकर मुंह फुलाकर बैठ गया है। ...हारकर बाप ने फिर से उसे समझाने की कोशिश की।
‘बेटा जिद कर। ...यह चीज तुझे नहीं मिल सकती।’ बाप ने पुचकारकर कहा।
‘नहीं, मुझे तो ये चइये ही चइये...’
‘कुछ और ले ले न।’
‘मुझे तो येई चइये!’
‘ये कैसे मिलेगी? ...अपनी थोड़ई है।’
‘पर मुझे तो येई चइये।’
बच्चे ने जिद्दी स्वर में कहा और मुंह फुलाकर चुप बैठ गया। दोगे, तभी बोलूंगा - ऐसा कुछ पोज है उसका।
‘तू कुछ और ले ले? ...अबे, बोल न?’
‘आप मेरी सुनते ही नहीं। क्यों बोलूं?’
‘क्या करूं? तू हर बात में तो अंट-शंट जिद करता है। कोई कब तक तेरी सुनेगा?’
‘मैं जिद्दी नहीं हूं। ...आपकी ही सोच गलत है।’
‘तो तेरी क्या सोच है - जरा मैं भी तो सुनूं?’
‘मेरी तो यही है कि मुझे तो येई चइये!’
‘फिर वोई बात।’
‘हां, मुझे येई चइये..’
‘और ये मिली तो?’
‘क्यों मिलेगी? ...मैं जमीन पर लोट-लोट जाऊंगा तब तो दोगे न?’
‘तू क्या सोचता है रे? क्या जिद करने से कुछ भी मिल जाएगा?’
वह देखता रहा बाप को और जमीन पर लोटकर ‘येई चइये’, ‘येई चइये’ कर रहा है। जिद पर जाए फिर वह मानता ही नहीं। नाक में दम कर डालता है पूरे घर की। जिद्दी बच्चा अपने ही बनाए संसार का तानाशाह होता है।
तभी तो वह रूठकर जमीन पर लोट रहा है।
और आश्चर्य की बात यह है कि उसे देखकर भी मुझे जाने क्यों, अभी तक, खेजरीवाल की याद फिर भी नहीं रही! ...हल्ले वाली क्रांतियों को आप, कितनी जल्दी, बच्चों के जिद्दी तमाशे की तरह भूल जाते हैं।
(लेखकजाने-माने व्यंग्यकार हैं)