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Gyan Chaturvedi: गणतंत्र दिवस पर तीन तिरंगा कथाएं

8 वर्ष पहले
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1. बोनट पर तिरंगा
गणतंत्र दिवस की ठिठुरती सुबह।
मंत्री झंडावंदन के लिए निकला है।
मंत्री की कार फर्राटे से निकली है।
कार के बोनट पर तिरंगा लगा है। सर्दी
भयंकर है। आसमान मेघों से घिरा है।
रातभर बूंदाबांदी होती रही। मावठा
बरसा है। सर्दी बढ़ गई है। अभी
हवा भी तेज चल रही है। कार और
तेज चल पड़ी। हवा को काटती तेज
भागती कार। बोनट पर लगा तिरंगा
सर्द हवा में फड़फड़ा रहा है। मंत्री बंद
कार में, बंद गले की गर्म शेरवानी में,
बैठा ऊंघ रहा है। उसे चिंता ही नहीं
कि उसने तिरंगे को किस मुसीबत में
छोड़ रखा है।
2. डंडा और झंडा
स्कूल में झंडा वंदन है आज। गणतंत्र की सर्द
सुबह में एकदम सुबह-सुबह, पीटी सर झंडा
बांधने पहुंचे तो देखकर अवाक रह गए। हाथ का
झंडा छूटते-छूटते बचा। मैदान में गड़ा वह डंडा
ही गायब था, जिसमें अभी झंडा लगाना था। ‘सर
वह डंडा ही किसी ने चुरा लिया है जिसमें..’,
पीटी सर मोबाइल पर हेडमास्साब को बता रहे
हैं। हेडमास्साब भागे-भागे आए। दोनों जन डंडे
की जुगाड़ में लग गए। स्कूल से कुछ दूर बनी
टाल से बांस का डंडा मिल गया। गाड़ दिया
गया। ‘झंडा लगा लेना। हम आते हैं’, कहकर
हेडमास्साब चल दिए। जाते-जाते, पलटकर वे
हंस कर बोले, ‘याद रखिएगा वर्माजी। जब तक
ठीक सा डंडा न हो, आप तिरंगा नहीं फहरा
सकते।’ पीटी सर मुस्कुरा दिए।
3. तिरंगा और धर्मध्वजा
वे देश में धर्म की सत्ता स्थापित करने
को कटिबद्ध लोग थे। इसके लिए वे
सालभर देश में दंगे आयोजित करने,
धर्म की राजनीति करने और
विधर्मियों की अक्ल ठिकाने लगाने
के मिशन में लगे रहते थे। वे हमेशा
अपनी धर्मध्वजा हाथ में लिए घूमते
थे। बस, गणतंत्र दिवस पर तनिक
परेशानी होती थी। उस दिन उन्हें
धर्मध्वजा त्यागकर तिरंगा उठाना
पड़ता था। पर तिरंगा भी वे धर्मध्वजा
की भावना से ही उठाते थे। वे तिरंगा
उठाते समय भी, उसका केवल
केसरिया या हरा रंग ही उठाए होते
थे। बाकी रंग तो बस यूं ही!