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Extra Shot:उच्च आदर्शो वाली राजनीति की दो अद्भुत मिसाल

7 वर्ष पहले
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सड़क के बीचों-बीच एक नुकीला पत्थर उभरा हुआ था। लोग निकलते। ठोकर खाते। गाली देते हुए आगे निकल जाते। पास ही चबूतरे पर एक साधक बैठे हुए थे। ठोकर खाकर आगे जाते आदमी को वे रोकते। गालियां देने के लिए धिक्कारते। क्रोध करने के लिए फटकारते। पत्थर को दूसरों के लिए उखाड़कर नहीं फेंकने के स्वार्थीपने पर प्रताड़ते। कुल मिलाकर उसे पास बैठाकर काफी देर तक समझाते। व्यक्ति नई अनुभूति के साथ वहां से जाता। फिर आता। फिर जाता। फिर आने-जाने लगता। एक दिन में औसतन 15-20 लोगों की नैतिकता जागृत कर दी जाती। सांसारिक माया-मोह से पर्दे हटाकर उन्हें अध्यात्म की दिशा में धकेल दिया जाता रहा। कुछ बरस इसी में बीते। पत्थर आज भी वहीं है। साधक ख्याति प्राप्त महात्मा हो चुके हैं। कई बार खाली क्षणों में अपने स्वर्ग जैसे तीन मंजिला भवन की खिड़की से जमीन पर गड़े उस पत्थर को बड़े गौर से देखते हैं। पत्थर के पास से चबूतरा हटाया जा चुका है। साधक की आंखें इन पलों में भीगने टाइप की हो जाती हैं। उनके शिष्य गुरु के चेहरे पर आए ऐसे आध्यात्मिक भाव देख निहाल हो-हो उठते हैं।प्रा चीनकाल में एक बार फिर महान महाबोध्य धौम्य ऋषि के आदेश पर आरुणि खेत की ओर चला। वहां जाकर देखता है कि एक बार फिर पानी देने वाली नहर टूटी पड़ी है। खेत में पानी भर रहा है। तत्काल ही उसने आसपास देखा। टूटे हिस्से को भरने के लिए उसे कुछ भी ना दिखाई दिया। इस पर तीक्ष्ण बुद्धि वाले आरुणि ने नहर को दूसरी ओर से भी तोड़ दिया। पानी पड़ोसियों के खेत में भरने लगा। फिर अपने खेतों की ओर जाकर टूटे हिस्से में हमेशा की तरह आरुणि खुद लेट गया। बाद में हमेशा की तरह क्लाइमेक्स में धौम्य ऋषि बाकी शिष्य मंडली सहित वहां पहुंचे। इतना मार्मिक दृश्य देखकर उन्होंने लगे हाथों स्पॅाट पर ही गुरुभक्त आरुणि को स्वर्ग का अधिपति बनने का वरदान दे दिया। जिन शिष्यों को आरुणि ने ठीक मौके पर गुरु को लाने का काम सौंपा था, उन्हें सत्ता पाने से पूर्व हुई सेटिंग के बदले स्वर्ग की कैबिनेट में स्थान दिया गया । जबकि जिनके खेतों में पानी भरा था, उन बेचारों को भविष्य में भी ऐसे ही किसी मौके की संभावना के तहत स्वर्ग के गेट पर चौकीदार रख लिया गया।
अनुज खरे, व्यंग्यकार