पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

EXTRA SHOT: भावनाओं की कट-पेस्ट...

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
उस दिन मेरा कम्प्यूटर मुझसे फालतू में ही उलझ रहा था। कमांड पे कमांड... कमांड पे कमांड... गुरु मेरे संग रह-रहकर मशीनी हो चुके हो तुम..!'
'अबे! तेरी ये मजाल स्क्रीन के अंदर ही बना रह। ज्यादा फैलने की कोशिश मत कर..!'
'गुरु! मैं तो रह लूंगा। तुम भी तो अपनी जिंदगी के अंदर रहने की कोशिश करो! मुझसे ज्यादा ही दोस्ती के चक्कर में तुम्हारे रिश्तों की कहीं वाट लग जाए।'
'अबे..! काहे किलप रहा है? क्या हो गया तुझे?'
'मुझे क्या होना है। हुआ तो तुम लोगों को है। जिस तरह से आप जिंदगी में भी शब्दों की 'कट-पेस्ट' और विचारों की 'असेंबलिंग' से काम चला रहे हो, उसी वजह से इन दिनों आपके रिश्ते 'रिफ्रेश' नहीं हो पा रहे हैं। आपको यूं नहीं लगता भावनाएं मशीनी होती जा रही हैं। 'कमांड' देकर 'स्विच ऑफ' और 'स्विच ऑन' करने वाली। संबंधों से गर्मजोशी गायब हो रही है। सुख है, सुविधा है, सुकून खो गया है। भागमभाग करके 'टारगेट' पूरे किए जा रहे हैं, जबकि राडार पर अपने बच्चे ही नहीं पा रहे हैं, उनके साथ बिताने के लिए समय ही नहीं है। भावनाएं 'फॉरवर्ड' की जा रही हैं, क्योंकि रोमांटिक बातों के लिए वक्त नहीं है। मैसेज भी पहुंच जरूर रहा है, लेकिन अहसासों का 'लाइनलॉस' प्रभाव नहीं छोड़ पा रहा है। इसीलिए तो बेजान हो रहे रिश्तों को रिसाइकिल बिन में डालकर अर्थी की तरह ढोया जा रहा है। इस दौरान आदमी के दिमाग में राम नाम सत्य की 'रिंगटोन' तो बिना कहे बजती रहेगी ना!'
'अबे हो क्यों रहा है ऐसा और हम करें तो करें क्या?'
'गुरु! सब इसीलिए हो रहा है, क्योंकि संबंधों को 'रिस्टार्ट' करने में पहल करने की समस्या आड़े रही है। 'सॉरी' ओल्ड वर्जन हो चुका है, जबकि ईगो के एक से बढ़कर एक वर्जन सामने रहे हैं। ऊपर से गलतफहमी के 'वायरस' से बचाने वाला करीबी दोस्तों या शुभचिंतकों वाला 'एंटी वायरस' हम-तुम वाली जिंदगी में अपलोड ही नहीं किया जा रहा है। नतीजा - अविश्वास का 'स्पैम' रिश्तों को 'करप्ट' कर रहा है।'
'हें...!'
'हां गुरु, जिन विषयों को प्राथमिकता के साथ डेस्कटॉप पर 'सेव' होना चाहिए, वे 'डिलीट' किए जा रहे हैं। मशीनी जिंदगी में सब सटीक है, बचकानापने की कोई गुंजाइश नहीं। सोचिए गुरु! रिश्ते कोई गणित का समीकरण होते हैं क्या? संबंधों के कोई तयशुदा फॉर्मूले हैं क्या? अरे रिश्तों में बचपना हुआ तो वे फलेंगे-फूलेंगे कैसे? तो गुरु किसी दिन मौका देखकर जिंदगी के कम्प्यूटर को 'रिबूट' कीजिए न! कुछ बचपने वाली फाइलें डाउनलोड कीजिए न! अच्छे पलों को हर बार 'सेव' कीजिए न! रोजमर्रा में 'स्पेस' का बटन दबाते रहिए न! जीवन में मॉल कल्चर के साथ मां-बाप को भी 'एंटर' कीजिए न! कड़वाहटों को 'रिप्लेस' करके निश्चित तौर पर जानिए आप उस एवरग्रीन मोड में जाएंगे, जहां खुशियों पर आपका पुख्ता 'कंट्रोल' होगा। जो जालिम जमाने के कितने भी जोर पर कहीं 'शिफ्ट' नहीं होगा। तो एक बार दुनिया-जहान की बातों को 'शटडाउन' करके मेरी इन बातों पर गौर करके तो देखिए, आपके रिश्तों की 'बैटरी' हमेशा 'फुलचार्ज' दिखाएगी, सच मानिए..!'
अनुज खरे
(लेखक युवा व्यंग्यकार हैं)