टन टना टन
टनटना टन टनन हो गए
हम बदन ही बदन हो गए।
देखते ही देखते एक दिन,
फूल कर ढाई मन हो गए।
गाल बढ़के महत्तम हुए,
तो लघुत्तम नयन हो गए।
चांद चमकी तो दर्पण हुई,
केश सारे हवन हो गए।
ऐसा विकसित हुआ है ये तन,
वस्त्र सब बे-बटन हो गए।
ऐसी चर्बी चढ़ी क्या कहें,
बस मटन ही मटन हो गए।
रोग मधुमेह का हो गया,
हलवा पूरी सपन हो गए।
सीना गजभर कमर डेढ़ गज,
‘शैल’ यूं गज बदन हो गए।
शैलचतुर्वेदी, कवि