आज नेताजी बड़े खुश हैं। एक अदने से कार्यकर्ता से शुरुआत कर अपनी पार्टी में बड़े ओहदे पर पहुंचे नेताजी का इतिहास स्वर्णिम अराजकताओं से भरा पड़ा है। वे उस दौर की उपज हैं, जब कट्टों के दम पर बूथ लूटे जाते थे। फिर शराब के ठेके उनकी चहुंओर प्रगति के उद्घोषक बने। पार्टी में भी वे लगातार प्रमोशन पाते गए। उनके विरोधी उन्हें नाना प्रकार के
उलाहने देते। लेकिन पता नहीं, उन्हें जिस एक शब्द से बड़ी चिढ़ थी, वह था अराजक। यह बात उन्हें कभी समझ में नहीं आई कि पार्टी के लिए सेवा करना अराजकता कैसे हो सकता है। एक बार उन्होंने पार्टी की बैठक में ही तमन्चा निकाल लिया था। फिर तो पार्टी के कुछ लोग ही पीठ पीछे उन्हें अराजक कहने लगे। सामने कहने की हिम्मत तो थी नहीं। लेकिन भला नेताजी से कोई बात छिप सकी है। उन्हें पता था कि कौन उन्हें अराजक कह रहा है। फिर कभी कुछ नहीं कहते। मन मसोसकर रह जाते। लेकिन उस दिन जब एक सूबे के मुखिया ने खुद कहा कि हां, मैं अराजक हूं तो उनका चेहरा चमक उठा। वे टीवी पर सुन रहे थे उस नेता के कमलमुख से यह वाणी। उनकी आंखों से अचानक आंसू बह चले।‘दद्दा, आंखों में आंसू, वह भी असली! आप ही तो कहते थे कि राजनीति में आंसुओं का कोई काम नहीं!’ एक पट्ठे ने अचरज से पूछा। नेताजी झेंप गए, ‘नहीं रे पगले, ये तो घड़ियाली आंसू हैं!’‘पर दद्दा हुआ गया?’ पट्ठे को कुछ समझ नहीं आ रहा था। ‘आज मैं धन्य हो गया। अब मैं भी गर्व से कह सकूंगा- मैं अराजक हूं। मैंने विरोधियों से यह मुद्दा भी छीन लिया।’‘लेकिन दद्दा, वे तो जनता के लिए अराजक बने, लेकिन आप तो..’ कहते-कहते पट्ठा रुक गया। अरे, बाप रे, यह गया उलटा-सीधा मुंह से निकल गया! ‘अबे चोप्प!’ एक समझदार से सीनियर कार्यकर्ता ने तत्काल उस पट्ठे की पीठ पर रपट्टा मारा, ‘अराजक-अराजक में काहे का भेदभाव? अराजक तो अराजक होता है, चाहे किसी ने बूथों पर मतपेटियां लूटी हों या फिर सड़कों पर जनता का चैन।’उधर, नेताजी तो गौरवान्वित हो रहे हैं। यह नई राजनीति का दौर है। अब बूथ नहीं लूटे जाते। तमन्चों, कट्टों को मखमली कारपेट के नीचे बुआरा जा चुका है। वे समझ गए हैं कि राजनीति के इस दौर में अब अराजक होना ही नहीं, अराजक दिखना भी महत्वपूर्ण है। इसलिए उन्होंने तख्तियां बुलवा ली हैं जिन पर लिखा है - मैं अराजक हूं।
ए. जयजीत