कल्पना करें कि जिस तरह अंग्रेजों का राज 200 वर्षों तक भारत पर था, वैसे ही यदि हमारा राज अंग्रेजों पर होता तो क्या होता? जैसे हम पर अंग्रेजीयत छाई हुई है, उन पर हिंदीयत छाई होती। हिंदी बोलने वालों को सभ्य और पढ़ा-लिखा माना जाता। आम बोलचाल में उनकी अंग्रेजी भाषा में हिंदी के कई शब्द शामिल होते और कुछ हिंदी शब्दों का समावेश तो ऐसे हो जाता जैसे कि वे अंग्रेजी के ही शब्द हों। उनका अंग्रेजी नाम आसानी से किसी को याद ही रहता। जैसे लौहपथ गामिनी (ट्रेन), द्वीचक्र वाहिनी (साइिकल) वगैरह। वहां शहरों से लेकर गांवों तक हिंदी सिखाने वाली संस्थाओं की भरमार होती। उनके अंग्रेजी विद्यालयों के पाठ्यक्रम में हिंदी एक अनिवार्य विषय होेता और हिंदी माध्यमों के विद्यालयों की तो शान ही निराली होती। अंग्रेजी सिर्फ मातृभाषा होने की मजबूरी के चलते सितारा पाठशालाओं में अनिवार्य रहती। वहां कुछ क्षेत्र के लोगों को मातृभाषा अंग्रेजी आती ही नहीं। अलबत्ता उनकी क्षेत्रीय भाषा या हिंदी ही आती। वहां एक वर्ग सदा हिंदी का विरोध करता पाया जाता। कुछ लोग हिंदी विरोधी नारे लगाते मिलते और कहते रहते कि, ‘सेव इंग्लिश। वी शुड वर्क इन इंग्लिश।’ फिर भी हिंदी का अपना महत्व होता और वह बढ़ता ही जाता। जितना विरोध होता, उतना महत्व बढ़ता। गोया कि एक तरह से उसका प्रचार होता रहता।
सरकारी स्कूलों में सिखाया जाता कि शुद्ध हिंदी बोलना अच्छा नहीं लगेगा। हिंदी के उच्चारण आम बोलचाल के होने चाहिए। वहां शिक्षक सिखाते कि कितने नहीं ‘कित्ते’ बोलो, उतने को ‘उत्ते’ बोलो, हां कुत्ते को कुत्ता ही बोलना पड़ेगा। वैसे श्वान भी कह सकते हैं। ‘जा रहा हूं’ को ‘जा रिया हूं’ बोलोगे तो ठीक रहेगा, क्योंकि आम बोलचाल की भाषा ऐसी ही होती है। रेड को लाल कहते हैं तो डीप रेड को ‘चट्ट लाल’ कहो, वहीं डीप यलो को ‘पट्ट पीला’ कहोगे तो लगेगा कि हिंदी अच्छी है। वहीं वेरी का मतलब होता है बहुत लेकिन उसे ‘भोत’ कहोगे तो ज्यादा अच्छा लगेगा। वहां के रहन-सहन पर भी हिंदुस्तानी रंग होता। सोचिए कि अंग्रेज पेंट-शर्ट या सूट की जगह धोती-कुर्ता या पायजामा-कुर्ता पहनते तो कैसे लगते? लुंगी-बनियान पहनकर लुंगी-डांस करते तो कैसे लगते?
कुल मिलाकर अंग्रेजों पर हिंदियत छाई होती। अंग्रेजी बोलने वाले पिछड़े कहलाते और हिंदी वाले हाईक्लास माने जाते। फिर अंग्रेजों को भी अंग्रेजी बचाने के लिए अंग्रेजी पखवाड़ा मनाना पड़ता। काश...!