न्यूयॉर्क, न्यूयॉर्क। इतना सुंदर शहर है कि इसका नाम दो बार लेना पड़ता है। ऐसा यहां के निवासी मानते हैं। यह भी कोई बात हुई? कहां जा रहे हो भाई? 'दिल्ली, दिल्ली!' क्या हो गया, हर चीज दोहरा रहे हो? 'ऐसे ही, ऐस ही' फिर चलिए दिल्ली तो छोटा नाम है। लेकिन 'विशाखापट्टनम, विशाखापट्टनम।' ऐसा कोई क्यों कहेगा? एक दफा ही नाम बोलना भारी पड़ रहा है, दो दफा में तो कहते-कहते ही शाम हो जाएगी।
बहरहाल यह बात यो न्यूयाॅर्क की आवाम को समझ नहीं आती है या इन स्सालों के पास कोई काम-धंधा नहीं है, इसलिए एक बात को बार-बार कहते हैं। मगर बात अगर दोहराने की है तो इसमें हमारी भाषाओं जैसी महारत कहीं और नहीं है। हम तो हर चीज दोहराते हैं। शायद आपने कभी गौर किया हो इस विषय में। हर चीज को हम बार-बार कहते हैं। जैसे कि मैंने अभी-अभी कहा 'बार-बार'। और फिर दोबारा कहा, 'अभी-अभी'। समझे बात? ऐसा हम क्यों करते हैं? बजाय कहने के कि मैंने अभी कहा हम कहते हैं मैंने 'अभी-अभी' कहा। बात का वजन शायद थोड़ा बढ़ जाता है। और इस वजन के चक्कर में हम हर जगह बात खींचते रहते हैं। रोटी बनाई है, 'गरम-गरम' खा लो। मतलब रोटी का तापमान थोड़ा और बढ़ गया है। अब यह रोटी केवल गरम नहीं, 'गरम-गरम' है! वाह री भाषा। दूर मत जाओ। 'पास-पास' ही रहो। मतलब साफ है। मेरे करीब ही नहीं, मुझसे चिपककर रहो। क्योंकि अगर खो गए तो 'दूर-दूर' तक कोई नहीं मिलेगा। देखा आपने कैसे दूर का दो बार इस्तेमाल होने से आपको दूरियों का और वीराने का सही अहसास हुआ। यह होता है कमाल शब्द दोहराने में। एक अकेला गिर जाएगा, मिलकर बोझ उठाना...। शब्दों को भी एक-दूसरे का सहारा चाहिए होता है। 'साथ-साथ' रहते हैं तो काम बंट जाता है।
चलिए वजन वाली बात तो समझे मगर इसका क्या? 'कौन-कौन' साथ चलेगा... या फिर 'सीधे-सीधे' चलते जाओ... या फिर 'आगे-आगे' देखो होता है क्या... या फिर जरा 'हौले-हौले' चलो मेरे साजना... या फिर 'धीरे-धीरे' से मेरी जिंदगी में आना सनम... या फिर 'कभी-कभी' मेरे दिल में...
मतलब इस फेहरिस्त का अंत नहीं है। शायद यही इस भाषा का मजा है, खास एक रंग है कि जहां मन किया वहीं एक शब्द और जोड़ दिया। लीजिए अब बोलिए। दूसरी किसी भाषा में हो सकता है यह कमाल? कोशिश करके देखिएगा। अगर अंग्रेजी में आप कहें कि, गो 'स्ट्रेट-स्ट्रेट'... या फिर ईट 'हॉट-हॉट'... या फिर 'हू-हू' इज कमिंग विद मी... तो अंग्रेजी भाषा इस वजन को उठा सकेगी और इस दोहरी मार से वहीं के वहीं ढेर हो जाएगी। यह कमाल हमारी भाषाओं में ही हो सकता है।
'जाते-जाते' एक और बात याद आई, मगर जाने दीजिए। अगली बार कहूंगा। आिखर हमारा-आपका रिश्ता तो 'हमेशा-हमेशा' का है।
by Rajat kapoor