वियतनाम युद्ध की शुरुआत 1955 में हो गई थी, जब उत्तर और दक्षिण वियतनाम में सत्ता के लिए संघर्ष छिड़ा था। कम्युनिस्ट झुकाव वाले उत्तरी वियतनाम को चीन, रूस, उत्तर कोरिया, का समर्थन था। इसी तरह दक्षिणी वियतनाम को अमेरिका, द. कोरिया और ऑस्ट्रेलिया का समर्थन हासिल था। 9 फरवरी 1965 के दिन दक्षिण वियतनाम में 3,500 अमेरिकी सैनिकों की पहली टुकड़ी उतारी गई थी। जानिए कैसे इस युद्ध ने ले लिया था भीषण रुप...
अमेरिका ने 1955 से 1965 तक वियतनाम में अपने सैनिक नहीं उतारे थे, लेकिन जब बहुत जरूरी हो गया, तब उसने सैनिकों की पहली टुकड़ी उतारी। इसका परिणाम ये हुआ कि उस दिन के बाद से इस युद्ध ने भीषण रुप ले लिया था। इसे कोल्ड वॉर प्रॉक्सी फाइट भी कहा गया। तीन साल बाद ही 1968 तक 5 लाख से अधिक अमेरिकी सैनिक वियतनाम में मोर्चा संभाल चुके थे। यहीं अमेरिकी सेना को पहली बार गोरिल्ला वार का अनुभव मिला था।
आधिकारिक तौर पर इस युद्ध में 58 हजार अमेरिकी सैनिक, चीन के 1100 और रूस के 16 सैनिक मारे गए थे। इसके अतिरिक्त 4 लाख से ज्यादा आम लोगों के मारे जाने के कारण इसमें भाग लेने वाले सहयोगी देशों को अंतरराष्ट्रीय आलोचना सहनी पड़ी थी। यही वह दौर था, जब अमेरिकी सैनिकों को 48 डिग्री सेल्सियस तापमान में युद्ध लड़ना पड़ा।
जंगल के कारण हजारों सैनिक लगातार संक्रमण की गिरफ्त में आ रहे थे। उनके लौटने की एक वजह यह भी थी। 15 अगस्त 1973 के दिन अमेरिका ने स्वीकार किया था कि उसे इतनी अधिक संख्या में सैनिक नहीं उतारने चाहिए थे। उधर, उत्तरी वियतनाम ने साइगॉन पर कब्जा कर 30 अप्रैल 1975 में युद्ध समाप्ति की घोषणा कर दी थी। माना जाता है कि इस युद्ध में अमेरिका की हार हुई थी।
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सोर्स- theatlantic.com