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फांसी की सजा के बाद पेन की निब क्यों तोड़ दी जाती है?

फांसी की सजा से जुड़े कुछ फैक्ट्स

Danik Bhaskar | Feb 05, 2018, 06:02 PM IST

नेशनल डेस्क. फिल्मों में अक्सर देखा होगा कि फांसी की सजा सुनाने के बाद जज साहब पेन का निब तोड़ देते हैं। आपको पता है कि ऐसा क्यों किया जाता है। सजा वाले दिन जल्लाद कैदी के कानों में क्या कहता है? जिस फंदे से कैदी को लटकाया जाता है उसे कौन बनाता है। इन सवालों के जवाब शायद ही पता हो। आज फांसी की सजा से जुड़े कुछ फैक्ट्स बताते हैं।

क्यों तोड़ी जाती है पेन की निब
भारतीय कानून में फांसी सबसे बड़ी सजा है। सुनवाई के बाद जब जज फांसी की सजा सुनाता है तो फैसले के बाद पेन की निब तोड़ देता है। ऐसा करने के पीछे संवैधानिक वजह है। एक बार फैसला लिख दिए जाने के बाद खुद जज को भी अधिकार नहीं होता है कि वो फैसले को बदल सके। इसके अलावा एक कारण और भी है। माना जाता है कि पेन से किसी की जिंदगी खत्म हुई है इसलिए उसका दोबारा प्रयोग न हो।

फांसी देते वक्त जेल अधीक्षक, एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट, डॉक्टर और जल्लाद का होना जरूरी है।

रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामलों में होती है फांसी
सुप्रीम कोर्ट ने 1983 में कहा था कि रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामलों में ही फांसी की सजा दी जा सकती है। निचली अदालतों में फांसी की सजा मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट भी फांसी की सजा पर मुहर लगा दे तो फिर राष्ट्रपति से दया की अपील की जा सकती है। अगर राष्ट्रपति भी अपील को खारिज कर दे तो फांसी दे दी जाती है।

जल्लाद कैदी के कान में क्या कहता है
फांसी देते वक्त जल्लाद कैदी के कान में कहता है कि 'मुझे माफ कर दो। मैं हुक्म का गुलाम हूं। मेरा बस चलता तो आपको जीवन देकर सत्य मार्ग पर चलने की कामना करता'।

सुबह होने से पहले क्यों देते हैं फांसी
ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि फांसी की वजह से दूसरे कैदी और काम प्रभावित न हो। सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश के मुताबिक जिस कैदी को फांसी दी जाती है उसके घरवालों को फांसी की तारीख से 15 दिन पहले खबर देना जरूरी है।

कैदी को जिस फंदे पर लटकाया जाता है वो सिर्फ बिहार के बक्सर जेल में कुछ कैदियों द्वारा तैयार किया जाता है।अंग्रेजों के जमाने से ही ऐसी व्यवस्था चली आ रही है।

मनीला रस्सी से फांसी का फंदा बनता है। दरअसल बक्सर जेल में एक मशीन है जिसकी मदद से फांसी का फंदा बनाया जाता है।

आखिरी इच्छा पूछे बगैर किसी कैदी को फांसी नहीं दी जा सकती है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक़, साल 2004 से 2013 के बीच भारत में 1,303 लोगों को फांसी की सज़ा सुनाई गई।