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लाइफस्टाइल डेस्क: अक्सर उद्यानों, सड़कों और घरों के आसपास सुंदर सफेद फूलों वाले मध्यम आकार के सप्तपर्णी के पेड़ देखे जा सकते हैं। यह एक ऐसा पेड़ है जिसकी पत्तियां चक्राकार समूह में सात-सात के क्रम में लगी होती हैं और इसी कारण इसे सप्तपर्णी कहा जाता है। इसका वानस्पतिक नाम एल्सटोनिया स्कोलारिस है। सुंदर फूलों और उनकी मादक गंध की वजह से इसे उद्यानों में भी लगाया जाता है। इन फूलों को अक्सर मंदिरों और पूजा घरों में भगवान को अर्पित भी किया जाता है। आदिवासियों के बीच इस पेड़ की छाल, पत्तियों आदि को अनेक हर्बल नुस्खों के तौर पर अपनाया जाता है। चलिए, आज जानते हैं सप्तपर्णी के औषधीय महत्व के बारे में।
1- आधुनिक विज्ञान इसकी छाल से प्राप्त डिटेइन और डिटेमिन जैसे रसायनों को क्विनाइन से बेहतर मानता है। आदिवासियों के अनुसार, इस पेड़ की छाल को सुखाकर चूर्ण बनाकर 2-3 ग्राम सेवन किया जाए, तो मलेरिया में तेजी से फायदा होता है। मजे की बात है कि इसका असर कुछ इस तरह होता है कि शरीर से पसीना नहीं आता, जबकि क्विनाइन लेने पर काफी पसीना आता है।
सप्तपर्णी के संदर्भ में रोचक जानकारियों और परंपरागत हर्बल ज्ञान का जिक्र कर रहे हैं डॉ. दीपक आचार्य (डायरेक्टर-अभुमका हर्बल प्रा. लि. अहमदाबाद)। डॉ. आचार्य पिछले 15 सालों से अधिक समय से भारत के सुदूर आदिवासी अंचलों जैसे पातालकोट (मध्य प्रदेश), डांग (गुजरात) और अरावली (राजस्थान) से आदिवासियों के पारंपरिक ज्ञान को एकत्रित कर उन्हें आधुनिक विज्ञान की मदद से प्रमाणित करने का कार्य कर रहे हैं।
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