अश्वत्थामा’ : महाभारत के शापित योद्धा की कथा, एक नए अंदाज में

5 वर्ष पहले
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महाभारत की गाथा का एक महत्वपूर्ण पात्र होने के बावजूद अश्वत्थामा सदा उपेक्षित रहा है। पौराणिक आख्यानों में ऐसे कई लोग हैं जिन्हें अमर माना जाता है। लेकिन अन्य लोगों को जहां अमरता वरदान के रूप में मिली तो अश्वत्थामा को 'शाप' के रूप में।
 
 
महाभारत के इसी शापित पात्र की कहानी है आशुतोष गर्ग की किताब ‘अश्वत्थामा : महाभारत का शापित योद्धा’। यह आशुतोष की पहली किताब है जो मंजुल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुई है।इससे पहले वे एक दर्जन से भी ज्यादा किताबों का अनुवाद कर चुके हैं। 

 
अश्वत्थामा की कहानी नई नहीं है, लेकिन इसे कहने का अंदाज नया है। महाभारत का यह शापित पात्र कृष्ण के श्राप के कारण हजारों वर्षों से  घावों से भरा जर्जर शरीर लिए भटक रहा है। इस किताब में वह अपनी कथा सुना रहा है। लेकिन आशुतोष इसी पात्र की जुबानी महाभारत की पूरी कहानी भी सुना जाते हैं। 

 
पूरी किताब में भाषा बहुत ही सहज और सरल है। चूंकि आशुतोष एक अच्छे अनुवादक भी हैं। अनुवादक का एक काम यह भी होता है कि वह मूल भाषा की आत्मा काे बदले बिना सरल से सरल शब्दों का चयन कर भावार्थ को अभिव्यक्त करें। शायद यही वजह है कि आशुतोष अपनी खुद की किताब में भाषा को इतनी सहज और सरल बनाए रखने में सफल रहे हैं। 

 
भाषा के साथ-साथ शैली और विषयवस्तु भी ऐसी है कि पाठक इसे जब पढ़ना शुरू करता है तो एक ही सांस में खत्म करना चाहता है। इसमें महाभारत की घटनाओं को इतने करीने से बुना गया है कि हर घटना के बाद पाठक को आगे पढ़ने की सहज ही जिज्ञासा होती है।

आशुतोष इस कहानी के जरिए एक बड़ा सामाजिक संदेश भी दे जाते हैं। यह संदेश है कि बुराई का नतीजा बुरा ही होता है। हालांकि इस कहानी के दौरान कई बार अश्वत्थामा सहानुभूति का पात्र बनता है। यही लेखक की सफलता है कि वे अपने पात्र की बुराई को उजागर करने के साथ-साथ उसके लिए थोड़ी-सी सहानुभूति भी बटोर लेते हैं। 
 
अगर अश्वत्थामा के कुछ अनछुए पहलुओं के बारे में जानने की जिज्ञासा है तो इस पुस्तक को जरूर पढ़ा जा सकता है। 
 
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