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  • Book Review: Aisi Waisi Aurat By Ankita Jain

'ऐसी वैसी औरतों' पर लिखी ये किताब मर्दों को जरूर पढ़ना चाहिए!

3 वर्ष पहले
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‘वक्त बेवक्त के ख्यालों में जब आप खुद को झूठ लगने लगें, जब बीत गए वो साल झूठ लगने लगें, जो जिया, जो अब तक किया वो झूठ लगने लगे, तो कहां जाओगे? कहां जा सकते हो? आधी रात के अंधेरे में जिंदगी जब काली हो जाती है न बेटा, तब वो झूठ चिल्लाता है, खुद को सच और सफेद बनाने के लिए लेकिन तब कुछ हो नहीं पाता, कुछ भी नहीं, तब सिर्फ एक परछाईं ही होती है गले लगाने...और मैंने अपनी परछाई को भी अलविदा कहने का मन बना लिया। अब सिर्फ अपने अस्तित्व के साथ जिऊंगी, किसी के भरोसे नहीं।’ (पेज 89, सत्तरवें साल की उड़ान)
 

पुरुष क्यों पढ़ें 'ऐसी वैसी औरत'

एक औरत के मज़बूत इरादे और साफगोई को बयां करती ये लाइनें अंकिता जैन के कहानी संग्रह ‘ऐसी वैसी औरत’ की सातवीं कहानी से है। इस संग्रह में अंकिता ने स्त्री के उन तमाम किरदारों को कागज़ पर उतारा है, जो कहीं न कहीं हमारे समाज में होकर भी समाज से अलग-थलग हैं। और अभी भी हैं। बावजूद इसके, यह कहानियां पुरुषों को जरूर पढ़नी चाहिए क्योंकि तभी वह समझ पाएंगे कि ‘ऐसी वैसी औरतें’ असल मे होती कैसी हैं?
 
‘ऐसी वैसी औरत’ उन 10 औरतों की कहानी है जिन्हें समाज में अच्छी नज़रों से नहीं देखा जाता। ऐसी गंदगी माना जाता है, जिसे अक्सर मिट्टी डालकर छिपाने की कोशिश होती है। मालिन भौजी, छोड़ी हुई औरत, एक रात की बात, उसकी वापसी का दिन और भंवर जैसी कहानियां आपको झकझोर देंगी। ऐसी ही एक 'वैसी' औरत की कहानी का अंश-
 
'ऐसी कौन-सी तकलीफ है, ऐसा कौन-सा गुनाह है जिसकी सज़ा वो खुद को लेस्बियन बनाकर दे रही है। ऐसा क्या हुआ होगा उसके साथ, जिसने उसे ऐसा बनने पर मजबूर कर दिया। वो लड़कियां मर्दों की तरफ से कितनी तनहा और रुसवा होती होंगी, जो लड़कियों में दिलचस्पी रखने लगती हैं। शायद अपने आसपास के मर्दों का कोई ऐसा रूप उन्हें इतना तकलीफदेह लगने लगता होगा कि उनके हिस्से का प्यार, जज़्बात भी वो औरतों में ढूंढने लगती हैं। ऐसी ही कोई वजह शैली के साथ भी होगी।'
 

लेखिका के बारे में

‘ऐसी वैसी औरत’ हिंदी में अंकिता की पहली किताब है। इससे पहले अंग्रेजी में ‘The Last Karma’ 2015 में प्रकाशित हो चुकी है। चंबल की घाटियों में बसे एक छोटे से गांव जौरा की रहने वाली अंकिता एमटेक हैं। भोपाल के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में कुछ साल लेक्चरर भी रहीं। नौकरी से मन ऊबा, तो कलम थाम ली। मैगज़ीन 'रूबरू दुनिया' निकाली। रेडियो पर अंकिता की दो दर्जन से ज्यादा कहानियां टेलिकास्ट हो चुकी हैं। 
 
 

अब शीर्षक ‘ऐसी वैसी औरत पर बात

शीर्षक चुनने का कारण इससे बेहतर बयां नहीं हो सकता। शुरुआत में ये लाइनें आपको दिमागी तैयार करती हैं कि आप क्या पढ़ने जा रहे हैं –
 
कभी तिराहे पर, 
कभी आंगन में टांगा, 
कभी किसी खटिया
तो खूंटी से बांधा,
कभी मतलब से 
तो कभी यूं ही नकारा
कभी जी चाहा तो,
खूब दिल से पुकारा
कभी पैसों से
तो कभी बेमोल ही खरीदा
मुझे पा लेने का
बस यही तो है तरीका
नाम था मेरा भी 
पर किसे थी जरूरत
कहते हैं लोग मुझे
ऐसी-वैसी औरत !
 

क्यों पढ़ें

हिंदी में आजकल जो लिखा जा रहा है, उसमें आम बोलचाल की भाषा बताकर गालियों और अनर्गलउदाहरणों की भरमार होती है, अंकिता के लेखन में ऐसा नहीं है। भाषाई लकीर को उन्होंने साफगोई के बाद भी नहीं लांघा है। यही इस किताब की सबसे बड़ी खूबी है। भाषा की सरलता औऱ सहजता इतनी कि पढ़ने वाला खुद को वहां मौजूद महसूस कर सके। एक कहानी पढ़कर आप बाकियों को बाद में पढ़ने की मन नहीं बना पाएंगे, इतना तय है। 
  प्रकाशकः हिंदी युग्म
मूल्य- 58 रुपए मात्र
अमेज़न पर उपलब्ध है।
 
 
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