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ट्राई के नेट न्यूट्रैलिटी के सुझाव से भारत में फ्री और ओपन इंटरनेट को बल मिला है

ये तर्क समझने के लिए काफी है: यदि हमारा संविधान आजादी का आश्‍वासन देता है तो वो ये बात इंटरनेट पर भी लागू होनी चाहिए।

Danik Bhaskar | Dec 09, 2017, 12:29 PM IST

मुझे लगता था कि वो प्रिंस मैटरनिच थे, जिन्‍होंने ‘ईस्‍टर्न क्‍वेश्‍चन’ के बारे में कहा था, ‘यूरोप में केवल तीन लोग थे, जिन्‍होंने इस बात को समझा, उनमें से एक की मौत हो चुकी है, दूसरा व्‍यक्ति पागल हो गया और मैं उसकी ज्‍यादातर बातें भूल चुका हूं।’ माफ कीजिए, इसे समझने के लिए आपको इतिहास का स्‍टूडेंट होना पड़ेगा।

नेट न्‍यूट्रैलिटी से जुड़ी कोई भी बात मेरे ऊपर ऐसा ही असर डालती है। लेकिन एक बार मुझे याद करने दें जो कुछ भी मैंने इसके बारे में पढ़ा है, मैं आपके साथ साझा कर रहा हूं।

क्‍या ये कभी आपके साथ हुआ है कि आपने अपना पसंदीदा न्‍यूज चैनल डेमोक्रेटिक देखने के लिए अपने स्‍मार्टफोन पर इंटरनेट लॉगइन किया और आपको आपके ऑपरेटर का नोटिस मिलता है: ‘हमारे पास अब ये न्‍यूज चैनल उपलब्‍ध नहीं है, कृपया क्‍या आप डिक्‍टेटर चैनल देखना चाहेंगे?’ क्‍या ये आपके साथ कभी हुआ है कि आपने ई-कॉमर्स कंपनी अपस्‍टार्ट से कोई गिफ्ट खरीदा हो, लेकिन आपका ऑपरेटर आपको केवल कालीबाबा का ही एक्‍सेस देता हो? आपको कभी ऐसा लगा है कि ओजोन के मुकाबले क्विक फिल्‍क्‍स पर फिल्‍में ज्‍यादा स्‍लो चलती हैं? या फिर आप हाइप-अप के मैसेंजर को एक्‍सेस नहीं कर सकते, केवल डाइक को कर सकते हैं?

सर्फिंग से जुड़ी ऐसी और इस तरह की दूसरी घटनाएं आप पर बस ऐसे ही नहीं आ पड़ी है, क्‍योंकि अब तक ऐसा चलन रहा है कि जो कंपनियां आपको कनेक्टिविटी या इंटरनेट एक्‍सेस देती है, वो इससे होकर गुजरने वाले डेटा के बीच अंतर नहीं कर पाती। आप इंटरनेट सब्‍सक्रिप्‍शन के लिए भुगतान करें और मुफ्त में अपना मनचाहा कंटेंट देखें या फिर उसके लिए अलग से भुगतान करके देखें।

ये सिद्धांत साउंड लॉजिक पर आधारित है कि इंटरनेट, स्‍वामित्‍व वाले या विभिन्‍न टेलीकॉम कंपनियों की पाइप की तरह ही एक जनसाधारण की सुविधा है। इस जनसाधारण की सुविधा को ओपन रखने की जरूरत है और इसे बिना किसी रोक-टोक के सबके लिए आसानी से उपलब्‍ध कराने की जरूरत है। ये सिद्धांत लोकतांत्रिक देश के भी अनुरूप है, जहां सरकारें मनमाने ढंग से सेंसरशिप लगाने से बचती है, जहां नागरिकों को समान अधिकार दिए जाने पर विश्‍वास किया जाता है। ये तर्क समझने के लिए काफी है: यदि हमारा संविधान आजादी का आश्‍वासन देता है तो वो ये बात इंटरनेट पर भी लागू होनी चाहिए।

पारंपरिक रूप से मान्य इस सिद्धांत के पहले उल्लंघन के संकेत यूएस में देखे गए, जहां बड़ी इंटरनेट कंपनियां और टेलीकॉम कंपनियां आधिकारिक रूप से इसमें आईं या उन्‍होंने ये प्रस्‍ताव रखा कि सामान्‍य शब्‍दों में कहा जाए तो टेलीकॉम कंपनियां वाणिज्यिक रूप से विचार करेंगी, चाहे वो स्‍पीड बढ़ाने की बात हो, कुछ साइट्स को ही प्रमोट करने या उसे सीमित करने की बात हो। दोनों ही पक्ष इस व्‍यवस्‍था के तहत साझीदारी करने के लिए उत्‍सुक थे, क्‍योंकि इससे दोनों ही पक्षों के व्‍यापारिक हितों की पूर्ति हो रही थी।

तकनीक की उस दुनिया में जहां यूएस को ज़ुकाम होता है तो छींक भारत को आती है। यहां दोनों चीजें एक साथ हुईं: ए- कुछ बड़ी कंपनियां इसी व्यवस्था के साथ टेली‍कॉम कंपनियों के साथ घुसने की कोशिश कर रही थी और बी- टेलीकॉम कंपनियां बिना किसी प्रयास के अतिरिक्‍त आय कमाने का ये मौका हथिया रही थीं।

इसके बाद यूएस और भारत में कहानी लगभग एक जैसी है: सामाजिक संगठनों और छोटी इंटरनेट कंपनियों द्वारा बड़े पैमाने पर एकजुट होकर विरोध किया गया। संस्‍थापक ने इसे इंटरनेट की आजादी छीनने के रूप में और इंटरनेट यूजर्स को चुनने और उससके एक्‍सेस के अधिकार से वंचित करने के रूप में देखा। इसके बाद, दूसरी ओर स्‍पष्‍ट रूप से ये देखा गया कि बड़ी और आर्थिक रूप से सुद़ृढ़ इंटरनेट कंपनियां नए उत्‍पादों और सेवाओं को बर्बाद करने की कोशिशों में लगी है और साथ ही प्रतिस्‍पर्धा को नष्‍ट कर रही है। बेशक, टेलीकॉम कंपनियां इस हो-हंगामे के बीच घाटा झेल रही है और इसमें कोई शक नहीं कि इस पक्षपातपूर्ण एक्‍सेस के सबसे सक्रिय प्रचारक, डेटा सेवाओं को प्रचारित कर रहे हैं। और चूंकि ये एक्‍सेस को लेकर था, कंटेंट को लेकर नहीं, उन्‍होंने इस सार्वजनिक गुस्‍से की मुख्‍य वजह को हवा दे दी।

जब परंपरा को कानून में बदलने की बात आई तो उसमें भारत और यूएस के रास्ते अलग थे। यूएस में (तत्कालीन) राष्ट्रपति ओबामा ने खुद इसका नेतृत्व किया और उनके निर्देशों पर एफसीसी ने ओपन इंटरनेट का आदेश पारित कर दिया। इस आदेश से टेलीकॉम कं‍पनियां प्रभावी रूप से आधारभूत संरचना प्रदाता में तब्दील हो गईं- केवल तटस्थ वाहक के रूप में (जैसा कि पहले परंपरा थी)। भारत में प्रधानमंत्री ने निवेश में कटौती के खतरे के बावजूद, टेलीकॉम कंपनियों की बढ़ती बीमारी और सामाजिक संगठनों के अत्‍यधिक दबाव के कारण, इस पर दृढ़तापूर्वक निर्णय लेने से इनकार कर‍ दिया। बुद्धिमानी से और सही रूप में उन्‍होंने इसे संस्‍थानों पर छोड़ दिया, ऐसी स्थिति में टेलीकॉम नियंत्रक ये तय करेगा कि टेलीकॉम कंपनियों का व्‍यवहार कैसा होना चाहिए। सारे हितधारकों के साथ गहन विचार-विमर्श के बाद टेलीकॉम रेग्‍युलेटरी अथॉरिटी इस सामान्‍य समाधान के साथ सामने आई कि समस्‍या को जड़ से पकड़ा जाए। ये सुझाव दिया गया कि टेलीकॉम कंपनियां कीमत के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकती है। ट्राई ने रणनीतिक रूप से नेट न्‍यूट्रैलिटी जैसे व्‍यापक मुद्दे, उससे निकलने वाले अपवादों आदि को यूं ही छोड़ दिया। ताकि आगे उस पर विस्‍तार से चर्चा की जा सके।

उसके बाद नेट न्यूट्रैलिटी के सिद्धांत पर जल्‍द ही बड़े पैमाने पर चर्चा हुई और जिस पर पिछले हफ्ते कुछ सुझावों के साथ निष्कर्ष पर पहुंचा गया। इस पर मैं बाद में आऊंगा। इसी बीच, यूएस में वो रीजीम बदल गया और उसे क्‍लासिक स्‍पॉइल सिस्‍टम पर आधारित कर दिया गया। एक रिपब्लिकन हितैषी को एफसीसी का नेतृत्‍व करने के लिए चुना गया। इस स्‍पॉइल्‍स सिस्‍टम में कुछ भी गलत नहीं है, और ना ही उस व्‍यक्ति में कोई बुराई है, जो एफसीसी का नेतृत्‍व कर रहा है। देखने में तो ये सामान्‍य बदलाव नजर आता है, लेकिन ये बदलाव बहुत व्‍यापक है।

यूएस में उन्‍होंने प्रमुख टेलीकॉम कंपनियों को छोटा कर दिया और ऐसा करने से एक तरफ बड़ी कंपनियों के बीच प्रतिस्‍पर्धा कम हो गई और वहीं दूसरी ओर बड़ी इंटरनेट कंपनियों के बीच भी। इस कार्य को अंजाम देने के दौरान इस बात को पूरी तरह भुला दिया गया कि एक तरफ सामाजिक संगठनों और छोटी इंटरनेट कंपनियों के बीच प्रतिस्‍पर्धा से शुरुआत हुई थी और दूसरी तरफ बड़ी इंटरनेट कंपनियों और टेलीकॉम कंपनियों के बीच प्रतिस्‍पर्धा थी। पहले जो बड़े पैमाने पर सार्वजनिक हित की बात थी, वो व्‍यापारिक संघर्ष पर आकर सिमट गया। उन्‍हें तथाकथित सिलिकॉन वैली कंपनियां कहकर सार्वजनिक रूप से उनकी आलोचना की गई और उन्‍हें नॉन-नेट न्‍यूट्रैलिटी रीजीम पर वापस जाने को कहा गया। ये staus quo ante में लौटने जैसा नहीं था। याद है, staus quo ante एक परंपरा थी, जहां टेलीकॉम कंपनियां भेदभाव नहीं करती थीं। एफसीसी प्रमुख पुरानी परंपरा पर लौटना चाहते थे और ऐसे रीजीम में जाना चाहते थे जहां टेलीकॉम कंपनियों को कानून के आधार पर भेदभाव करने की अनुमति थी!

भारत में चीजें और भी सूक्ष्म हो गईं। हाल ही में ट्राई कई सारे सुझाव लेकर आया है, जिसमें बाकी चीजों के बीच इन्‍हें सुनिश्चित किया गया: ए- आप इंटरनेट पर क्‍या एक्‍सेस करते हैं उसमें भेदभाव ना हो, बी- टेलीकॉम कं‍पनियों ने अपना नेटवर्क चुनने की यथोचित आजादी दी है, सी- महत्‍वपूर्ण अपवादों को सामने लाया गया कि नेट न्‍यूट्रैलिटी को बहुत अधिक घुटन वाला नहीं बनाया जाएगा।

सबसे महत्‍वपूर्ण बात ये कि मुझे ऐसा लगता है कि टेलीकॉम कंपनियों ने अपनी लड़ाई छोड़ दी है, बड़ी इंटरनेट कंपनियों ने ट्रैफिक बढ़ाने के दूसरे रास्‍ते ढूंढ लिए हैं और यूजर्स खुश हैं कि ट्राई ने फ्री और ओपन एक्‍सेस के सिद्धांत की बात को दोहराया है। हां, ये केवल सुझाव हैं। लेकिन व्‍यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि कुछ चीजें बहुत अच्‍छी हैं, कड़े कानून की तरह पहरे में नहीं है, खासतौर से हमारे देश में जहां कानून बनाना बेहद ही कठिन काम है और कानून की किताब से उसे मिटाना उतना ही दुष्‍कर! ट्राई सही रूप में और बड़ी ही आसानी से बिना किसी दबाव के हमें staus quo ante की ओर वापस ले गया। मुझे लगता है हम इसके साथ रह सकते हैं।

शुभो रे, अध्‍यक्ष, इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया। ये उनके निजी विचार हैं।