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एक ऐसा मंदिर जहां होती है योनि की पूजा, 16 रहस्य, जो कोई नहीं जानता

ये हैं कामाख्या मंदिर से जुड़े 16 रहस्य, जो कोई नहीं जानता।

Danik Bhaskar | Oct 03, 2013, 12:22 AM IST
भोपाल: कामाख्या मंदिर सबसे पुराना शक्तिपीठ है। यह एक हिंदू मंदिर है और देवी मां कामाख्या के लिए समर्पित है। असम राज्य में स्थित यह मंदिर गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से 10 किलोमीटर दूर नीलांचल पहाड़ी पर है।
एक बार मां कामाख्या मंदिर का दर्शन करने के बाद यात्रियों को अहसास हो जाता है कि असम राज्य का इतिहास कितना समृद्ध है। टूरिस्ट कामाख्या मंदिर पर अटूट विश्वास रखते हैं और दर्शन कर अपने को धन्य मानते हैं। कहा जाता है सति का योनिभाग कामाख्या में गिरा था।
इस मंदिर के बारे में कई अनसुनी कहानियां प्रचलित हैं। आज हम आपको स्लाइड के जरिए इस मंदिर से जुड़े 16 रहस्य बता रहे हैं जो आपने पहले कभी नहीं सुने होंगे।

कामाख्या शक्तिपीठ 52 शक्तिपीठों में से एक है। हिंदू धर्म के पुराणों के अनुसार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आए। इस तीर्थस्थल पर शक्ति की पूजा योनिरूप में होती है। यहां कोई देवी मूर्ति नहीं है। योनि के आकार का शिलाखंड है, जिसके ऊपर लाल रंग की गेरू के घोल की धारा गिराई जाती है। 

कहते हैं कि 16वीं सदी में इसे नष्ट कर दिया गया था। फिर कूच बिहार के राजा नर नारायण द्वारा 17वीं सदी में पुन: बनाया गया था। 

इस मंदिर में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला 'अंबुवासी' मेले को कामरूपों का कुंभ कहा जाता है। इसमें देश भर के साधु और तांत्रिक हिस्‍सा लेते हैं। शक्ति के ये साधक नीलाचल पहाड़ की विभिन्न गुफाओं में बैठकर साधना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि 'अंबुवासी मेले' के दौरान मां कामाख्या रजस्वला होती हैं। 

हवाई जहाज़ से भी कामाख्या जा सकते हैं। यहां का अन्तरराष्ट्रीय हवाई-अड्डा कामाख्या से 19किलोमीटर की दूरी पर है।

मंदिर के बाहरी शिखरों पर मधुमक्खी के छ्त्ते की तरह की आकृतियां बनी हैं। इन के बाहरी भाग पर गणेश, देवी और देवताओं  की मूर्तियां बनी हैं। इस मंदिर की मनोहारी वास्तुकला देख कर अनुमान हो जाता है कि यह एक विशिष्ट मंदिर है। मुख्य मंदिर में सात अण्ड़ाकार शिखर है। हर एक के ऊपर तीन सुनहरे घड़े रखे हैं।
‘कलिका पुराण’ में शिव की युवा दुल्हन और मुक्ति प्रदान करने वाली शक्ति को कामाख्या कहा गया है। श्रद्धालुओं  का  विश्वास  है  कि  सती  के  पिता  दक्ष  ने  अपनी पुत्री सती और उस के पति शंकर को  यज्ञ ने अपमानित किया और शिव जी को अपशब्द  कहे।तो उस ने दुःखी हो कर आत्म-दहन कर लिया। शंकर  ने सति  के मॄत-देह को उठा कर संहारक नृत्य किया। तब सती के  शरीर  के 51 हिस्से अलग-अल्ग जगह पर गिरे जो 51 पीठ कहलाये। कहा जाता है सति का योनिभाग कामाख्या में गिरा। उसी  स्थल पर कामाख्या  मन्दिर का निर्माण किया गया।
 

इस पवित्र स्थान के दर्शन के लिए असख्य श्रद्धालु लंबी कतारों में खड़े हो जाते हैं। धीरे-धीरे पर्यटकों की यह  लाइन गर्भ गृह की ओर चलती हैं। यहां देवी-देवताओं की मूर्तियां सिंहासन पर रखी जाती हैं। भीतरी भाग से गर्भ-गृह की ओर ले जाने वाला रास्ता सकरा है, जो प्रद्क्षिणा-पथ कहलाता है। नीचे पवित्र स्थान पर जाने के लिए सीढ़ियां हैं। यहां एक पृथ्वी भीतरी योनि की आकृति की दरार है, जिससे एक फुव्वारे की तरह जल निकलता है। श्रद्धालु उस जल में पूजा करते हैं। वहां पर सांकेतिक अंग लाल कपड़े से ढ़्का रहता है। 

कामाख्या में प्रतिवर्ष दुर्गा पूजा की जाती है। पांच दिन के त्यौहार में जहां हजारों लोग दर्शन के लिए आते हैं। कामाख्या मां को केवल नर और काले रंग के भैंसे, बकरी, बन्दर, कछुए इत्यादि की बलि चढ़ाई जाती है। कुछ लोग कबूतर, मछली और गन्ना भी चढ़ाते हैं। प्राचीन काल में देवी को प्रसन्न करने के लिए मानव-शिशु बलि भी चढाई जाती थी, पर समय के साथ-साथ इस प्रथा को बंद कर दिया गया।

मंदिर की सीढ़ी की दिलचस्प कहानी:
 
एक राक्षस नारका को देवी कामाख्या से प्यार हो गया। वह उनसे शादी करना चाहता था। देवी को जब यह बात पता चली तो उन्होंने उसके सामने एक शर्त रखी। अगर नीलांचल पहाड़ी के नीचे से मंदिर तक सीढ़ियों का निर्माण एक रात में वह कर दे तो वह निश्चित रूप से शादी कर लेंगी। 

राक्षस नारका ने इसे चुनौती के रूप में लिया और इस कार्य में अपनी पूरी ताकत लगा दी। राक्षस को सीढ़ियां बनाने के काम में कामयाब होते देख देवी ने एक चाल चली और भोर का आभास देने के लिए एक मुर्गा बनाया। देवी कामाख्या की यह चाल काम कर गई और नाराका ने अपने काम को बीच में ही अधूरा छोड़ दिया। इसके बाद देवी ने उस मुर्गे को पीछे खींच लिया और उसे मार दिया। अब इस जगह को दारांग जिल में स्थित कुकुराकाटा के रूप में जाना जाता है। वहीं अधूरी पड़ी सीढ़ियों को मैखेलाजुआ पथ के रूप में जाना जाता है। 

मां कामाख्या देवी की रोजाना पूजा के अलावा भी साल में कई बार कुछ विशेष पूजा का आयोजन होता है। इनमें पोहन बिया, दुर्गाडियूल, वसंती पूजा, मडानडियूल, अम्बूवाकी और मनसा दुर्गा पूजा प्रमुख हैं। 

दुर्गा पूजा: हर साल सितम्बर-अक्टूबर के महीने में नवरात्रि के दौरान इस पूजा का आयोजन किया जाता है। 

अम्बुवाची पूजा: माना जाता है कि देवी की माहवारी के दौरान तीन दिन के लिए मंदिर बंद कर दिया जाता है। चौथे दिन जब मंदिर खुलता है तो इस दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। तांत्रिकों की साधना के लिए विख्यात कामाख्या देवी के मंदिर में मनाया जाने वाला पर्व अम्बूवाची को कामरूप का कुम्भ माना जाता है।  

पोहन बिया: पूसा मास के दौरान भगवान कमेस्शवरा और कामेशवरी की बीच प्रतीकात्मक शादी के रूप में यह पूजा की जाती है

दुर्गाडियूल पूजा: फाल्गुन के महीने में यह पूजा कामाख्या में की जाती है। 

15. वसंती पूजा: यह पूजा चैत्र के महीने में कामाख्या मंदिर में आयोजित की जाती है।

16. मडानडियूल पूजा: चेत्र महीने में भगवान कामदेव और कामेश्वरा के लिए यह विशेष पूजा की जाती है। 

आगे की स्लाइड में जानिए यहां कैसे पहुंचे...

इसकी रहस्‍यमय भव्‍यता और देखने योग्‍य स्‍थान के साथ कामाख्‍या मंदिर न केवल असम, बल्कि पूरे भारत का चकित कर देने वाला मंदिर है। वैसे भी कामाख्या मंदिर अपनी भौगोलिक विशेषताओं के कारण बेहतर पर्यटन स्थल है। यहां साल भर लोगों का आना-जाना लगा रहता है। यह मंदिर गुवाहाटी रेलवे स्‍टेशन से कुछ किलोमीटर की दूरी पर है। यह पूरे साल भक्‍तों के लिए खुला रहता है। हवाई हजाज या रेलगाड़ी से देश के किसी भी हिस्‍से से गुवाहाटी पहुंचा जा सकता है, जहां से टैक्‍सी लेकर मां के दर्शन के लिए जाया जा सकता है। यहां रहने के लिए बजट होटल से सितारा होटल तक की अच्‍छी व्‍यवस्‍था है।