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कैसे आया ‘मां’ शब्द और क्यों वर्षो बाद मां की तस्वीर देखना अद्भुत लगता है

8 वर्ष पहले
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जिंदगी में कदम-कदम पर मुश्किलें आती हैं, लेकिन मां कभी भी हौसला नहीं हारती.न ही बच्चों को हारने देती है.उसका संघर्ष अनवरत है। दुनिया में उससे जुड़े फलसफे भी लगभग एक से ही हैं। आखिर कुछ तो है वरना आधी दुनिया में क्यों उसे मां या इससे मिलते-जुलते शब्दों में ही पुकारा जाता है।
मदर्स-डे पर विशेष: चंदा कोचर ने मां के जीवन संघर्ष और साहस की कहानी भास्कर से साझा की।
देश के सबसे बड़े प्राइवेट सेक्टर बैंक आईसीआईसीआई और उसकी एमडी चंदा कोचर। कामयाबी की इस बुलंदी को हासिल करने की बुनियाद चंदा की मां सुनीता अडवाणी ने ही रखी थी। चंदा के पिता की मृत्यु के बाद उनकी मां ने पहली बार घर से बाहर निकलकर डिजाइनिंग को कॅरियर बनाया। सुनीता का यही कदम उनके तीनों बच्चों के लिए आगे बढ़ने की डोर बनी। मदर्स-डे पर चंदा ने साझा की मां की परवरिश और हौसले की कहानी..मेरे लिए मां पहले भी सबकुछ थीं और आज भी हैं। पीछे मुड़कर देखती हूं तो जयपुर का वक्त याद आता है जब पापा अचानक दुनिया को अलविदा कह गए थे। पापा एमएनआईटी में प्रिंसिपलथे और मां होममेकर।
मैं स्कूल में पढ़ रही थी। भाई इंजीनियरिंग कर रहा था और दीदी मेडिकल की पढ़ाई। मैं सिर्फ 13 साल की थी। मां.. हादसे के बाद उनकी जिंदगी तो हमारे इर्द-गिर्द ही ठहर गई थी। डिजाइनिंग का शौक था मां को। उन्होंने तय किया कि इसे कॅरियर बनाएंगी। जयपुर में कुछ साल रहने के बाद हम सब मुंबई चले गए। मां मेरी रोल मॉडल बन गईं। आज भी उनसे बात करना ऊर्जा और मोटिवेशन देता है। मैं चाहे जितनी भी व्यस्त रहूं, दुनिया के किसी भी कोने में रहूं, मां से रोज कुछ पल बात करने की कोशिश करती हूं।
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