दोस्तो, 4 अक्टूबर को है ‘वर्ल्ड एनिमल डे’। आज कई ऐसी प्रजातियां हैं, जो या तो पूरी तरह से खत्म हो चुकी हैं या खत्म होने की कगार पर हैं। उन्हीं के बचाव और संरक्षण के लिए यह दिन मनाया जाता है। व्हाइट टाइगर या सफेद बाघ भी इन्हीं जानवरों में से एक है।
सफेद बाघ बाघों की ही एक प्रजाति है। यह सफेद रंग उन्हें उनकी पीढ़ी से ही मिला है। वर्तमान में सफेद बाघों की संख्या काफी कम है। यह सुन्दर और आकर्षक जानवर आज के समय में चिड़ियाघर और अभयारण्य में ही देखा जा सकता है।
क्यों होता है सफेद रंग
सफेद बाघ के पैरेंट्स सामान्य रंग के भी हो सकते हैं। इनका यह सफेद रंग बंगाल टाइगर के कलर डिस्ऑर्डर के कारण होता है। कुछ सफेद बाघ ऑरेंज और व्हाइट रंग के बीच के होते हैं, इन्हें ‘गोल्डन टैबी टाइगर’ कहते हैं।
कहां पाए जाते हैं?
सफेद बाघों की संख्या बहुत कम है। यूके के वेस्ट मिडलैंड सफारी पार्क में सबसे ज्यादा सफेद बाघ हैं। ये भारत में मुख्य रूप से असम, बंगाल, बिहार और रीवा में पाए जाते हैं। इन्हें रॉयल बंगाल, इंडियन टाइगर और बंगाल टाइगर भी कहा जाता है। ओडीशा के नंदनकानन को सफेद बाघों का ‘होस्ट जू’ भी कहा जाता है। वर्तमान में यहां लगभग ३४ सफेद बाघ हैं।
पहला सफेद बाघ
मई 1951 में रीवा के महाराजा श्री मरतड सिंह बांधवगढ़ के जंगल में शिकार कर रहे थे। माना जाता है कि राजा ने सफेद बाघिन को मारा, जिसके चार छोटे बच्चे थे, जिनमें से एक सफेद था। सभी बंगाल टाइगर उसी की पीढ़ी हैं।
लाइफस्टाइल
बाघों की दूसरी प्रजातियों की तरह सफेद बाघ भी अपना शिकार ढूंढने के लिए घने अंधेरे जंगल में अकेले ही निकलते हैं और दिन में सोते हैं। वे अपना अधिकतर शिकार रात में ही करते हैं। ये अंधेरे में इंसानों से 6 गुना बेहतर देख सकते हैं। यह 140 से 300 किग्रा वजन तक के होते हैं। बाघों की स्ट्रिप्स इंसानों के फिंगरप्रिंट्स की तरह होती हैं। किन्हीं भी दो बाघों के स्ट्रिप का पैटर्न मैच नहीं होता। बाघों का जीवन 10 साल तक का होता है।
कल्चर
सफेद बाघों के सुंदर और आकर्षक होने की वजह से इनका जिक्र साहित्य, वीडियो गेम्स, कॉमिक बुक्स आदि में किया जाता है। 2008 में मेन बुकर पुरस्कार विजेता अरविंद अडिगा का उपन्यास ‘द व्हाइट टाइगर’ एक बच्चे की कहानी है, जो बाकी लोगों से स्मार्ट होता है, जैसे कि सफेद बाघ पूरे जंगल में सबसे अलग होता है।
भोजन
मीडियम और बड़े आकार के जानवर सफेद बाघ का भोजन होता है, जैसे- चीतल, नीलगाय, सांभर, बारहसिंघा आदि। ये छोटे जानवर जैसे- खरगोश और बंदर भी खाते हैं। सफेद बाघ अच्छे तैराक भी होते हैं। इसलिए ये मछली और मगरमच्छ भी खाते हैं।
भोजन
मीडियम और बड़े आकार के जानवर सफेद बाघ का भोजन होता है, जैसे- चीतल, नीलगाय, सांभर, बारहसिंघा आदि। ये छोटे जानवर जैसे- खरगोश और बंदर भी खाते हैं। सफेद बाघ अच्छे तैराक भी होते हैं। इसलिए ये मछली और मगरमच्छ भी खाते हैं।
स्ट्रिपलेस व्हाइट टाइगर
कई सफेद बाघों में ब्लैक स्ट्रिप भी नहीं होती, जिससे वे पूरे सफेद दिखाई देते हैं। 2004 में स्पेन में नीली आंखों वाला एक स्ट्रिपलेस व्हाइट टाइगर का जन्म हुआ। इसका नाम ‘आर्टिको(आर्कटिक)’ रखा गया। इसके पैरेन्ट्स ऑरेंज बंगाल टाइगर थे।
इंसानों से रिश्ता
सफेद बाघों को हमेशा से ही कैद में रखा गया है। इंसान इन्हें अपने फायदे, बिजनेस और पैसों के लिए इस्तेमाल करते आए हैं। लोग इनका शिकार करते हैं और कई बार बाघ गांवों में घुसकर लोगों को नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए बाघों का इंसानों से रिश्ता अच्छा नहीं रहा है।
सफेद बाघों का संरक्षण
सफेद बाघ के बचाव में सरकार ने कई एक्ट लगाए हैं। इनका शिकार करना या इन्हें नुकसान पहुंचाना गैरकानूनी है। वर्ष 1900 के पहले एशिया के जंगलों में 1 लाख से ज्यादा टाइगर थे। लेकिन आज के समय में लगभग 8000 बाघ ही बचे हैं, जिनमें से 2000 बंगाल टाइगर हैं। सफेद बाघ अब सिर्फ चिड़ियाघरों और अभयारण्यों में ही मिलते हैं। इन्हें बचाना बेहद जरूरी है।