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जिंदगी के अनुभवों में नंबरों के कोई मायने नहीं होते

8 वर्ष पहले
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इस सप्ताह मैं फ्लाइट से राजस्थान में भास्कर उत्सव में भाग लेने के लिए मुंबई से जोधपुर जा रहा था। मुझे किनारे के तरफ वाली सीट मिली थी। बीच की सीट पर एक महिला अपने छह माह के बेटे को हाथ में लिए बैठी थी। जबकि खिड़की वाली सीट पर उसके छह साल के बेटे ने कब्जा जमा रखा था। मेरे ठीक सामने वाली पर भी यही स्थिति थी। किनारे वाली सीट पर मेरी तरह ही एक यात्री बैठे थे। उनके बीच की सीट पर एक मां अपने दस महीने के बच्चे को लिए बैठी थी। खिड़की वाली सीट पर उसका सात साल का बेटा बैठा था। विमान उड़ चला था। मैं और मेरे जैसे ही सामने वाली सीट पर बैठे सज्जन अखबार पढ़ने में व्यस्त हो गए। जबकि माताएं अपने नवजात बच्चों की जरूरतों को पूरा करने में लग गईं। वहीं खिड़की वाली सीट पर बैठे हुए बच्चे कुछ देर बाहर देखते रहे।
फिर एक-दूसरे से बातों में मशगूल हो गए। बड़े बच्चे ने (जो सात साल का था) अपने पीछे वाले से पूछा, ‘तुम्हारा नाम क्या है?’ थोड़ी ही देर में दोनों के बीच परिचय हो चुका था। इसके बाद बड़े बच्चे ने छोटे वाले से उसके स्कूल के बारे में पूछा। उसके जन्म की तारीख, राशि, राजस्थान में उसके गांव का नाम पूछा। अपने बारे में भी यह सब चीजें बताईं। अपने पैतृक गांव के बारे में बताने के लिए छह साल के बच्चे को बीच में अपनी मां की मदद लेनी पड़ी। बीच में बड़े बच्चे ने छोटे वाले को थोड़ा परेशान भी किया। यह कहकर, ‘मैं तुमसे एक साल बड़ा हूं। मैं २क्क्४ में पैदा हुआ और तुम २क्क्५ में।’ हालांकि इससे छोटा वाला ज्यादा परेशान नहीं हुआ। इसकी वजह ये थी कि वह जिस स्कूल में पढ़ता था वह बड़े वाले बच्चे के स्कूल से बेहतर माना जाता था। जहां रहता था वह कॉलोनी भी बड़े बच्चे की कॉलोनी से बेहतर कही जाती थी। यहां मुझे इन दोनों के बीच प्रतिद्वंद्विता की गंध आ रही थी।
दोनों अब एक-दूसरे से ‘नहले पर दहला’ वाले अंदाज में बात कर रहे थे। बता रहे थे कि कैसे उनका स्कूल उन्हें नेशनल पार्क या चिड़ियाघर के बजाय दूर-दराज के इलाकों में पिकनिक पर ले जाता है। आस-पड़ोस के यात्री भी अब बच्चों की बातों का मजा लेने लगे। कान लगाकर सुन रहे थे कि आखिर यह बातचीत पहुंचती कहां है। इसी बीच संकेत हुआकि यात्री अपने सीट बैल्ट खोल सकते हैं। फिर क्या था। बड़ा बच्चा तो अब अपनी सीट पर खड़ा ही हो गया। खिड़की के बाहर देखने के लिए बादलों के सिवा कुछ था नहीं। रवि नाम था इस बच्चे का। और उससे एक साल छोटे बच्चे का विनोद। उसने आखिरी सवाला दागा जो चौंकाने वाला था। रवि ने पूछा, ‘विनोद, तुम्हारे छोटे भाई की उम्र कितनी है।’ विनोद को जवाब पक्का पता नहीं था। वह अपनी मां की तरफ मुड़ा। उससे पूछा, ‘मां हमारा गुड्डू कितना बड़ा है।’ उसने बताया, ‘छह महीना’ और उस छोटे बच्चे को दूध पिलाना शुरू कर दिया।
जैसे ही विनोद ने अपने छोटे भाई की उम्र बताई रवि अपनी सीट से उछल पड़ा। चिल्लाकर बोला, ‘देखो मेरा भाई तक तुम्हारे भाई से बड़ा है। वह दस महीने का है।’ विनोद का चेहरा उतर गया। उसने मां की तरफ देखा और पूछा, ‘हमारा गुड्डू १क् महीने का क्यों नहीं है? छह महीने का ही क्यों है?’ एकदम से पूछे गए इस सवाल से उसकी मां बुरी तरह झेंप गई। आस-पड़ोस में बैठे यात्री ठहाका लगाकर हंस पड़े।
दोनों बच्चों को महसूस हुआ कि कुछ गड़बड़ हो गई। उन्होंने कुछ देर के लिए बातचीत बंद कर दी। इस बीच विनोद की मां ने काफी कोशिश की उसे यह समझाने की कि गुड्डू की उम्र १क् महीने नहीं की जा सकती। लेकिन बच्चे को समझ नहीं आया। वह पूरी उड़ान के दौरान मुंह फुलाए बैठा रहा। उसे लग रहा था कि वह अपने नए दोस्त से मुकाबले में चार महीने से ‘हार’ गया है। एक पल के लिए मैं यह सोच का डर गया कि अगर ये दोनों एक-दूसरे से अपने-अपने विषयों के नंबर पूछना-बताना शुरू कर देते तो क्या होता। यकीनन इनमें किसी न किसी की गर्मियां की छुट्टियां खराब होना तय था।
पहली बार मैंने अपने जीवन में स्कूल के उस सिस्टम को शुक्रिया कहा जिसके तहत आठवीं कक्षा तक अंक देने का सिस्टम खत्म कर दिया गया है। बहरहाल, ये तनावपूर्ण हालात उस वक्त सामान्य हुए जब विमान जोधपुर में उतरने लगा। दोनों ने सेना के कुछ हेलीकॉप्टरों, लड़ाकू जहाजों को आकाश में उड़ते देखा। जाहिर तौर पर दोनों ही काफी रोमांचित हो गए थे। अब ये दोनों फिर से दोस्त थे और एक-दूसरे से भारतीय सेनाओं के बारे अपनी-अपनी जानकारियां बांट रहे थे।
फंडा यह है कि : जब बात तनख्वाह, उपलब्धियों, विश्लेषण आदि की हो तभी नंबर अहमियत रखते हैं। लेकिन जीवन के दूसरे क्षेत्रों में, अनुभवों में शायद ही इनकी कोई अहमियत हो।