पहली कहानी: कई देशों में ड्राइवर गाड़ी चलाते हुए उनींदे से रहते हैं। थके रहते हैं। बहुत आम बात है। लेकिन जानलेवा सड़क दुर्घटनाओं का जिक्र करते वक्त कोई भी इस तथ्य पर ध्यान नहीं देता। जबकि अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी सड़क दुर्घटनाओं में हो रही मौतों की बड़ी वजह ड्राइवरों की थकान है। आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। ड्राइवरों को लगता है कि खिड़कियों के कांच खोलकर, कॉफी-चाय पीकर या संगीत सुनकर वे अपनी नींद दूर भगा सकते हैं। थकान कम कर सकते हैं। लेकिन यह सच नहीं है। नींद का कोई विकल्प नहीं है। यानी नींद लेने से ही यह दूर होती है।
हाईवे पर खासकर, जब लंबा रास्ता एक सा होता है, तब गाड़ी चलाने वाले के ऊपर आमतौर पर नींद असर दिखाती है। लेकिन इसके बावजूद कई ड्राइवर तो यह मानते ही नहीं कि उन्हें नींद आ रही है। इसी वजह से कभी-कभी सेकंड के भी किसी हिस्से में ली उनकी झपकी बड़े एक्सीडेंट का कारण बन जाती है। कई दवाइयों की वजह से भी नींद आती है। बहुत से ड्राइवर इसके बारे में जानते ही नहीं। वे अपनी किसी बीमारी के लिए दवा तो लेते हैं लेकिन नींद नहीं। इससे भी दिक्कत खड़ी हो जाती है। गाड़ी चलाते हुए 10 सेकंड या उससे भी कम की एक झपकी दुर्घटना का कारण बन सकती है।
दुनिया में होने वाली कुल सड़क दुर्घटनाओं में से 40 फीसदी सिर्फ नींद के झोंके की वजह से हो जाती हैं। इसी तथ्य के मद्देनजर आईआईटी मद्रास ने एक ऐसा यंत्र बनाया है जो ड्राइवर को हमेशा चौकन्ना रखता है। दरअसल, जब भी हमारे शरीर पर नींद हावी होती है तो शरीर में कई तरह के परिवर्तन होते हैं। मसलन मांसपेशियों का ढीला पड़ जाना। शरीर में होने वाले इन परिवर्तनों को यह यंत्र तुरंत पहचान लेता है। और तुरंत ड्राइवर को अलार्म बजाकर चौकन्ना कर देता है। इस यंत्र के कई परीक्षण हो चुके हैं।
ये सभी अब तक सफल रहे हैं। कई साइंटिफिक जर्नल्स में इसके बारे में छप चुका है। आईआईटी मद्रास ने इस यंत्र के पेटेंट के लिए भी अर्जी लगाई है। साथ ही इसके व्यावसायिक उत्पादन पर भी विचार किया जा रहा है। इस यंत्र की कीमत कितनी होगी, यह अभी तय नहीं है। लेकिन इतना तय है कि यह जल्द ही बाजार में उपलब्ध हो जाएगा। हो सकता है इसकी मांग और उत्पादन ज्यादा हो तो कीमत भी कम ही रह जाए।
दूसरी कहानी: सिर्फ बेंगलुरू शहर में ही 48 फीसदी पानी गटर से होकर कावेरी नदी में बह जाता है। हर रोज करीब 50.9 करोड़ लीटर पानी डिस्ट्रीब्यूशन लाइनों में लीकेज आदि की वजह से बर्बाद हो जाता है। इसकी वजह से नगरीय निकाय को हर साल 50 करोड़ रुपए का भी नुकसान होता है। तेजी से हो रहे शहरीकरण ने यह स्थिति निर्मित की है। देश के इस पांचवें महानगर के इन हालात पर अध्ययन भी हुए हैं। अमेरिका में विस्कोंसिन के इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल एंड इकोनॉमिक चेंज ने एक अध्ययन किया है। इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च ने इस अध्ययन में सहयोग किया। इस अध्ययन की रिपोर्ट दिसंबर 2013 में जारी की गई। इसमें साफ तौर पर कहा गया है कि अगर शहर में पानी के संकट से निपटना है तो सबसे पहले लीकेज की समस्या से निपटना होगा। इसमें बारिश के पानी के संरक्षण, जल प्रबंधन को बेहतर करने, पानी के अनधिकृत उपयोग को रोकने की सलाह भी दी गई है। रिपोर्ट में दिए गए सुझावों को अमल में लाने के लिए पायलट प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो चुका है।
अब इन दो कहानियों से हमें क्या सीख मिलती है? ये कि सबसे पहले उस जगह को चिन्हित कीजिए जहां ज्यादा नुकसान हो रहा है। भले वह जीवन से जुड़ा हो या संसाधनों से। इसके बाद अपनी ऊर्जा को उस नुकसान को कम करने के तरीके ढूंढ़ने में लगाएं। यानी समस्या का समाधान कैसे हो, यह देखने में। इससे आपको संतोष मिलेगा कि आपने कुछ बड़ी उपलब्धि हासिल की है। साथ में आपको यह भी लगेगा कि आपने अपने संगठन और उससे भी ज्यादा देश के लिए कुछ प्रोडक्टिव काम किया है।
फंडा यह है कि..
हमेशा अपनी ऊर्जा को बड़े मकसद की तरफ लगाइए। यह हर तरह से आपके लिए फायदेमंद रहेगा।