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कितनी भी ऊंचाई पर पहुंच जाएं अपनी जड़ों को न भूल

8 वर्ष पहले
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सुबह के 5.10 बजे थे। प्रदीप कलानी गहरी नींद में था। तभी उसका मोबाइल घनघनाया। दूसरी तरफ से रौबीली आवाज गूंजी, ‘कहां हो तुम।’ प्रदीप ने शांति से जवाब दिया, ‘सर अभी सो रहा हूं।’ फिर उतनी ही शांति से आगे जोड़ा, ‘सर, २क् मिनट में मैं आपके होटल पहुंच जाऊंगा।’ प्रदीप की टैक्सियां चलती हैं। जिसने उसे फोन किया था वह कोई यात्री था। उसने टैक्सी किराए पर ली थी। उसे सुबह उदयपुर से दिल्ली की फ्लाइट पकड़नी थी। इसके लिए 6.14 पर एयरपोर्ट पहुंचना था। जिस होटल में वह रुका था, वहां से एयरपोर्ट करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर था। इस हिसाब से प्रदीप को किसी भी सूरत में 5.30 तक होटल पहुंच जाना चाहिए था। रविवार का दिन था इसलिए ड्राइवर नहीं आया था। इसलिए प्रदीप को खुद ही टैक्सी ले जानी थी। चूंकि प्रदीप उस वक्त तक नींद में ही बोल रहा था इसलिए उसका ग्राहक झल्ला गया। उसने फोन पर कहा, ‘तुम लोगों को समय की कोई कीमत ही नहीं है। छोटे शहर के लोगों के साथ हमेशा यही दिक्कत रहती है। तुम मेरी फ्लाइट छुड़वा दोगे।’ लेकिन यह सुनकर भी प्रदीप शांत रहा। बहुत नरमी से उसने अंग्रेजी में बोलते हुए अपने ग्राहक को यकीन दिलाया कि वह उसे फ्लाइट के निर्धारित समय से पहले ही 6.05 पर एयरपोर्ट छोड़ देगा। इससे पहले ठीक 5.29 पर होटल पहुंच जाएगा। हम 5.30 बजे होटल छोड़ने के निर्धारित समय पर ही चेक-आउट कर देंगे। ग्राहक अंग्रेजी में इस तरह के उत्तर की अपेक्षा नहीं कर रहा था। उसे यह तो पता था कि उदयपुर के टैक्सी ड्राइवर थोड़ी-बहुत अंग्रेजी बोल लेते हैं क्योंकि वे अक्सर विदेशी पर्यटकों के संपर्क में आते रहते हैं। लेकिन प्रदीप ने जिस तरह से बात की वह आम ड्राइवर की भाषा नहीं थी। उसे सुनकर न सिर्फ उसका गुस्सा ठंडा हो गया बल्कि वह सोचने पर मजबूर हो गया कि उसने कुछ ज्यादा ही सख्ती से ही बात कर दी है।
जो भी हो, ठीक सुबह 5.20 पर प्रदीप टैक्सी लेकर होटल के पोर्च में था।
लगभग 5.31 पर वह अपने ग्राहक के साथ एयरपोर्ट की तरफ रवाना हो चुका था। थोड़ी देर बाद उस ग्राहक ने प्रदीप से बातचीत शुरू कर दी। पूछा, ‘इतनी अच्छी अंग्रेजी कैसे सीखी।’ प्रदीप ने अपनी कहानी बताना शुरू किया, ‘सर मैं एक गरीब परिवार से हूं।
हमने 1997में छोटे स्तर पर यह बिजनेस शुरू किया। धीरे-धीरे उसे बढ़ाना शुरू किया। लेकिन ड्राइवरों की कमी से परेशानी आती है। इसलिए जब भी जरूरत पड़ती है हम खुद ग्राहक की जरूरत पूरी करने के लिए ड्राइवर के तौर पर काम कर लेते हैं। आखिरकार बिजनेस में ग्राहक की जरूरत तो पूरी करना ही है। रविवार को ड्राइवर को डिस्टर्ब करना भी ठीक नहीं। उनका भी तो परिवार है।’ ग्राहक ने बीच में टोका, ‘यह तो बड़ी अच्छी बात है।
लेकिन अब तक तुमने नहीं बताया कि आखिर अंग्रेजी तुम इतनी अच्छी कैसे बोल लेते हो? प्रदीप ने जवाब दिया, ‘सर, मैं महिंद्रा एंड महिंद्रा शोरूम में काम करता हूं। कुछ महीने पहले ही मुझे न्यू कार डिवीजन में लगाया गया है। इसमें क्वांटो बेची जाती है। इसके चार मॉडल ७.५ लाख से शुरू होकर 9.21 लाख तक की कीमत के हैं। मैं कंपनी के वैरिटो मॉडल को बेचने में भी मदद करता हूं। इसके तीन मॉडल हैं और रेंज 7.25 से 8.31 लाख तक। पिछले ढाई साल तक मैं यूज्ड कार डिवीजन में था। पुरानी गाड़ियों को खरीदने-बेचने का काम करता था।
हमारे डिवीजन का नाम था फस्र्ट च्वाइस। यहीं काम करते हुए मैंने अंग्रेजी में पकड़ बना ली।’इसी बीच वे एयरपोर्ट पहुंच गए। उतरते समय उससे हाथ मिलाते हुए ग्राहक ने पूछा, ‘तुम इस टैक्सी बिजनेस को छोड़ना क्यों नहीं चाहते?’ प्रदीप ने शांति से जवाब दिया, ‘सर, मैं अपनी जड़ों को कैसे भूल सकता हूं। यह बिजनेस मेरे परिवार का बरसों से भरण-पोषण रहा है।’ ग्राहक मुस्कराया और हाथ हिलाते हुए डिपार्चर गेट की तरफ बढ़ गया।
फंडा: आप जिंदगी में कितनी भी ऊंचाई पर पहुंच जाएं लेकिन अपनी जड़ों को कभी न भूलें। इससे आप हमेशा जमीन से जुड़े रहेंगे। उदार रहेंगे। अपनी जमीन को जब तक याद रखेंगे मानवीय रहेंगे।