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यंग एंटरप्रेन्योरः छोड़ा लॉस एंजिल्स, बिहार में बनाया भविष्य

8 वर्ष पहले
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बिहार के बैठानिया गांव में जन्मे ज्ञानेश ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से इजीनियरिंग की और उसके बाद न्यूयॉर्क के रेनसिलिर पॉलीटेक्निक इंस्टीट्यूट से इलेक्ट्रिक पावर एंड पावर इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में मास्टर्स डिग्री हासिल की। इसके बाद ज्ञानेश लॉस एंजिल्स में इंटरनेशनल रेक्टिफायर कंपनी के साथ सीनियर यील्ड एनहैंसमेंट इंजीनियर के रूप में काम कर रहे थे, लेकिन यह ज्ञानेश का मकसद नहीं था।

गांवों में काम करने की तीव्र इच्छा ज्ञानेश को लॉस एंजिल्स से बिहार खींच लाई। अमेरिका में अपना सफल कॅरिअर छोड़कर लाखों लोगों की जिंदगियों को रोशन करने के सपने के साथ ज्ञानेश भारत लौट आए। बिहार लौटकर ज्ञानेश ने हस्क पावर सिस्टम्स (एचपीएस) की स्थापना की। ज्ञानेश और उनके तीन दोस्तों ने मिलकर इस पर काम करना शुरू किया। एचपीएच चावल की भूसी से बिजली उत्पादन करके सस्ती दरों पर ग्रामीणों को बेचती है। गैसीफायर सेल्समैन कृष्णा मुरारी ने इस काम में ज्ञानेश की मदद की।

आइडिया -

गैसीफायर वह उपकरण होता है, जो पलांट मटीरियल को गैस में तब्दील कर देता है, जिसका इस्तेमाल ईंधन के रूप में हो सकता है। इस दौरान ज्ञानेश को पता लगा कि चावल मिलों के लिए बिजली उत्पन्न करने के लिए चावल की भूसी को ऑक्सीजन नियंत्रित गैसीफायर में जलाया जाता है। हालांकि मात्र यही तकनीक पर्याप्त नहीं थी। असल में चावल की भूसी से पैदा होने वाली गैस में टार काफी मात्रा में था। पांडे ने तरीका ढूंढ़ निकाला।

टार के इंजन को जाम करने से पहले उसे साफ करने पर इस समस्या से छुटकारा मिल रहा था। पांडे ने दोस्तों के साथ मिलकर ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया, जिसमें भूसी को ऑक्सीजन के साथ जलाने पर एक गैस बनती है, जो इंटरनल कंब्यूशन इंजन को चलाती है। इससे अल्टरनेटर के माध्यम से बिजली उत्पन्न होती है। तकनीक चल निकली और 2008 में बिहार का पश्चिम चंपारन का तमकुहा गांव पहली बार रोशनी से जगमगा गया। ऐसा आजादी के 60 साल बाद हुआ था।

ऐसी मिली सफलता -

एचपीएच के पास सफलता की सारी सामग्री उपलब्ध थी। चावल की भूसी 60 रुपए प्रति क्विंटल में उपलब्ध थी। 500 घरों को रोशनी पहुंचाने के लिए 32 किलोवाट बिजली की जरूरत थी, जिसके लिए प्रतिदिन तीन क्विंटल चावल की भूसी चाहिए थी। एक पलांट को संचालित करने का खर्च एक महीने के लिए 20,000 रुपए था। बिजली की सप्लाई प्रतिमाह 80 रुपए की कीमत पर हो रही थी जिससे दो सीएफएल (15 वाट प्रत्येक) और एक मोबाइल चार्जिग पॉइंट के लिए बिजली मिलती थी।

एचएफएस सूर्यास्त के बाद गांवों को 7-8 घंटे बिजली सप्लाई करती थी। तीन सालों में एचपीएस ने 24 प्लांट लगाए और 80 गांवों के 12,000 घरों को रोशनी पहुंचाई। एचपीएस करीब 8 से 10 घंटे 18,500 घरों को रोशनी पहुंचाती है। 1.5 लाख से ज्यादा ग्रामीणों को फायदा हुआ है। 250 लोगों को रोजगार मिला। कुछ अलग करने का ज्ञानेश का आइडिया न केवल सफल रहा बल्कि एक मिसाल के रूप में कायम हुआ है।