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बच्चे के साथ बढ़ें आप!

9 वर्ष पहले
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अभिभावकों की चर्चा किसी भी विषय से शुरू हो, घूम-फिर कर बच्चों की पढ़ाई पर पहुंच जाती है। और बच्चे की पढ़ाई का मुद्दा आते ही तीन तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं।
पल्ला झाड़ो : आजकल की पढ़ाई हमारे बस की नहीं। छोटी कक्षाओं में भी इतना भारी-भरकम सिलेबस! तौबा-तौबा।
बहाने बनाओ : हम दोनों ही कामकाजी हैं, हमारे पास समय रहता ही नहीं कि बच्चों की किताबें पलट भी सकें।
रोना रोओ : हमारा बच्च पढ़ाई में मन लगाता ही नहीं। मार्क्‍स अच्छे कैसे आएं!
फिर एकमत से निष्कर्ष यह निकलता है कि कड़ाई बरतो, उसे जबरदस्ती पढ़ने बिठाओ। सारी सुविधाएं जुटा दो। सबसे अच्छा उपाय होगा कि उसे ट्यूशन/कोचिंग के लिए भेज दो। फ़ीस की कोई दि़क्क़त नहीं है।
लेकिन क्या ये उपाय कारगर होते हैं? इनसे आपकी चिंताएं हल हो जाती हैं? इन सवालों के जवाब ईमानदारी से देने की कोशिश करें।
आप बाक़ी चीजों के लिए टाइम मैनेजमेंट कर सकते हैं, तो निश्चित ही अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए भी समय निकाल सकेंगे?
जिन किताबों को देखकर बड़ों को पसीना छूट जाता है, बच्च उन्हें पढ़ने में रुचि नहीं लेता, उनमें जबरदस्ती कितनी कारगर होगी? आप पढ़े-लिखे हैं। कामकाजी हैं। नर्सरी, प्रायमरी और मिडिल स्कूल की किताबें समझना आपके लिए क्या वाक़ई मुश्किल होगा?
क्या आपको लगता है कि कोई और व्यक्ति (जैसे ट्यूटर) आपके बच्चे के मन और रुचियों को आपसे बेहतर समझ सकता है?
जाहिर है, अभिभावकों की जिम्मेदारी अच्छे स्कूल में दाख़िला कराने, किताबें ला देने और कड़ाई करने तथा ट्यूटर लगाने तक सीमित नहीं हैं। बच्च पढ़ाई में मन लगाए, उसमें आनंद ले और कुछ सीखे, इसके लिए जरूरी है कि उसे वैसा माहौल मिले। यह आपकी जिम्मेदारी है।
बच्चे की पुस्तकें एक बार पलटकर तो देखें। बहुत कुछ आपका पढ़ा हुआ है। उसे याद करें। जो नई चीज है, उसे पढ़ें, समझें, संदर्भ खोजें। इसमें आपको आनंद आएगा और आपकी जानकारी भी दुरुस्त होगी।
योजनाबद्ध ढंग से समय बचाएं। ग़ैर जरूरी चीजों पर लगाम लगाएं। आलस्य त्यागें। यह समय बच्चे और उसके अध्ययन को दें।
जितने मनोयोग से बच्चे के लिए डिजाइनर कपड़े चुनते हैं, उतना ही मन लगाकर उसके लिए सहायक सामग्रियां चुनें। विज्ञान, इतिहास, गणित, भाषा आदि विषयों से जुड़ी दिलचस्प किताबें बाÊार में मौजूद हैं। बच्चे के लिए चित्रों, गीतों और पहेलियों वाली किताबें पढ़ना खेल की तरह होता है।
बच्चे को वास्तविक दुनिया से परिचित कराएं। जिन पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों को वह किताबों में देखता है, उनसे रूबरू कराएं। घर के छोटे-मोटे हिसाब बच्चे को हल करने दें। वह इस ‘गणित’ में ख़ुशी-ख़ुशी शामिल होगा। कहानियों के जरिए उसे इतिहास से परिचित कराएं।
बच्चे की जिज्ञासा को कभी भी टालें नहीं। यदि जवाब नहीं मालूम, तो उससे कहें कि आप एक निश्चित समय बाद उसे विस्तार से समझाएंगे। इस बीच किताब, इंटरनेट आदि स्रोतों से जवाब पता करें और अपना वादा पूरा कर दें।
बच्चे की ख़ूबियों को प्रोत्साहित करें। तुलना न करें। उसे समझाएं कि सारे विषयों का महत्व है। उसे जिज्ञासु बनाने का प्रयास करें।
इन सबके लिए माता-पिता को मेहनत करनी पड़ेगी। अपनी जानकारी बढ़ानी होगी, अपडेट रहना होगा। यानी ख़ुद भी जानना, समझना और पढ़ना पड़ेगा। यही तो चुनौती है। और यक़ीन मानिए, यह बड़ी मजेदार चुनौती है।
दुनिया बदल रही है। आप भी अपना नजरिया बदलें। मम्मी हों या पापा, बस सीखते रहें। फिर देखिए, बच्च कितनी तेजी से और मजे-मजे से पढ़ता-सीखता है!