जम्मू-कश्मीर में बारशि के कारण नदी-नहरें उबल पड़ीं। श्रीनगर में झेलम नदी ने अचानक अपने कनिारे तोड़ दएि। उस इलाक़े को पानी-पानी कर दयिा, जसिने ख़ुद को हमेशा इस तरह की मुश्कलिों से महफ़ूज़ माना था।
क़ुदरत भी अजीब शै है। इंसान को याद दलिा ही देती है कि उसके बस में कुछ नहीं। जब वो अपनी मनमानी करेगी, इंसान को सब भुला देगी। वो तमाम भेद भी, जन्हिें लोग अब तक अपनी ज़िन्दगी से भी बड़ा मानते रहे हैं। सैलाब सब नाप लेता है। नापकर, बराबर करके दखिा देता है कुछ बड़ा नहीं क़ुदरत से, कुछ छोटा नहीं कसिी से।
आपदाएं एकाएक यह भी अहसास करा जाती हैं किसी-किसी के सुख-दुख अलग नहीं होते। बछिुड़ने की तक़लीफ और मलिने की ख़ुशी सबको एक-सी होती है। भूख, सर्दी, प्यास और अपनों का साथ- इसका अहसास कसिी के लएि अलग नहीं होता। राहत की कोई ज़ात-पात नहीं होती। डूबते की तरफ़ मदद को बढ़े हाथ का कोई रंग नहीं देखता है और न कोई उससे पूछता है कि वो सजदे में उठता है या प्रार्थना में जुड़ता है।
कहा जा रहा है कि जब आपदा का पानी उतरेगा, तो महामारी आएगी। इसके मायने ये भी हैं कि एक बार यह मुश्कलि टल गई, तो हमारे समाज में बरसों से जो भेद की, दुश्मनी और नफ़रत की महामारी पहले से मौजूद है वो दोगुने वेग से आएगी।
काश, हम सेना से सीख सकते। उनकी तरह का हौसला पा सकते। बनिा कसिी अपेक्षा के मदद करते, बनिा कसिी ख़तरे की परवाह कएि हर मुश्कलि के सामने से अपने लोगों को नकिाल लाते।
लेकनि यह मुमकनि है ही नहीं। सुख की तलाश को ज़िन्दगी मानने वाले लोग, दुखों-मुश्कलिों से लड़कर ज़िन्दगी को बचाने वाले फौजयिों जैसे नहीं हो सकते। उन्हें बचाना आता है, मदद करनी आती है, ख़ुद को भूलकर दूसरों की तरफ़ राहत का हाथ बढ़ाना आता है, तभी तो इतने नर्भिीक होते हैं। हम ख़ुद में इतने गुम हैं कि अपने साए से भी डरते हैं।
जो आपदाओं की आज़माइश से गुज़रते हैं, कहते मलिते हैं की वो रात, वो दौर या वो वक़्त हमेशा हमें डराता रहेगा। हम उसे कभी भूल नहीं पाएंगे। कोई नहीं कहता कि इस आज़माइश से जो सीखा-समझा उसे हमेशा याद रखेंगे। जब सम्भलते हैं, तो केवल शकिायतें करते नज़र आते हैं। तपने से कुंदन नहीं बनते दलि अब?
क़ुदरत का क़हर आईना दखिा ही जाता है।