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शक्तिम प्रणमाम्यम

7 वर्ष पहले
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भगवती शक्ति जगत का पालन करती है। शक्ति के बिना संसार अशक्त हो जाता है। शक्ति ‘ई’ कारांत है, स्त्रीलिंग है। शक्ति के अभाव में शिव भी ‘शव’ हो जाता है। शक्ति ही जगन्माता है। नारी स्वरूपा है। मां है। ऋग्वेद के दशम् मंडल के 125वें सूक्त में आदिशक्ति जगदम्बा कहती हैं- ‘मैं सम्पूर्ण ब्रह्मांड में भूलोक व सर्वलोक का विस्तार करती हूं। अखिल विश्व मेरी विभूति है।’ शारदीय नवरात्र को ‘शाक्त महापर्व’ भी कहा जाता है। यह शक्ति संचय का महापर्व है। पूजा, अर्चना, व्रत, उपवास, जप, तप से शक्तिसंचय होता है। मां की कृपा प्राप्त होती है।

नवरात्र के पहले दिन घट (कलश) की स्थापना करने का विधान है। इसके लिए मंदिरों व घरों में पूर्व-उत्तर दिशा की ओर शक्ति चिह्न के रूप में एक चौकी पर जल से भरा एक मिट्‌टी का कलश रखें। इस पर रोली से स्वस्तिक बनाएं। कलश के मुख पर मौली लपेटें। इसके अंदर गंगा जल, चंदन, दूर्वा, पंचामृत, सुपारी, साबुत हल्दी, रोली, कुशा डालें। अब इसके मुख पर 5 या 7 आम के पत्ते रखें। ऊपर से चावल से भरा कोई पात्र रख दें। अब कुमकुम, हल्दी, अक्षत और दीपक से कलश का पूजन करें। साथ ही दो बड़े कटोरों में काली मिट्‌टी भरकर रखें। इनमें गेहूं व ज्वार के दाने बोकर ‘जवारे’ उगाएं। प्रतिदिन घट के सम्मुख शुद्ध आसन पर बैठकर दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा, दुर्गा स्तोत्र या शक्ति मंत्र का जाप करें। अंतिम दिन हवन करके नौ कन्याओं को भोजन कराकर जवारे पानी में विसर्जित करने का विधान है।
कठोर तप और व्रत का विधान पूरा करना आपके लिए सम्भव नहीं, तब भी मां भगवती को प्रसन्न कर शुभफल प्राप्त कर सकते हैं।

इन दिनों रोज़ दुर्गा सप्तशती का पाठ करना अच्छा माना जाता है। समयाभाव के चलते आप पूरा पाठ नहीं कर सकते, तो रोज़ इसके मध्यम चरित्र (अध्याय-2, 3 और 4) का पाठ करें। इसके अलावा दुर्गा स्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं। यह भी सम्भव न हो, तो सामान्य पूजन के साथ इस मंत्र का 108 बार जाप करेंं-
नौ दिन सुबह जल्दी उठें और स्नान अादि से निवृत्त होकर देवी मंदिर जाएं। वहां पैदल भी जा सकते हैं। इससे स्वास्थ्य लाभ मिलेगा और प्रात:काल देवी दर्शन व मंदिर का भक्तिमय माहौल सुकून देगा।
देवी माया हैं, जो सभी भ्रमों को आत्मसात करती हैं। वे शक्ति हैं, ऊर्जा का व्यक्तिपरक रूप। वे आदि हैं। मतलब उतनी प्राचीन और सीमाहीन, जितनी आत्मा। आदि-माया-शक्ति की प्रतीक दुर्गा अजेय हैं। वे एक ही समय में दुल्हन भी हैं और योद्धा भी। वे एक रूप में घर स्थापित करती हैं, सुख देती हैं, बच्चे पैदा करती हैं और भोजन उपलब्ध कराती हैं। दूसरे रूप में वे रणक्षेत्र में जाती हैं और वध करती हैं। जो उनकी शरण में आता है, उसकी रक्षा करती हैं और जो चुनौती देता है, उसका संहार करती हैं। वे शेर को भी शांत कर उसे सवारी बना लेती हैं। काली और गौरी देवी के मूलत: प्राकृतिक और घरेलू स्वरूप हैं।

देवदत्त पटनायक (पेंगुइन बुक्स द्वारा प्रकाशित ‘मिथक=मिथ्या’ से )