हमने प्यार या विवाह किया। एक व्यक्ति के इर्दगिर्द अपने सपनों का संसार बुन लिया। उस शख़्स से दुनियाभर की उम्मीदें भी जोड़ लीं। और फिर दिक़्क़त शुरू हो गई!
प्यार और विवाह सबसे ज़्यादा किस कारण से दरकते हैं?
प्रेम दिवस के ठीक पहले यह सवाल बड़ा अजीब लगेगा, लेकिन शायद इसी में प्यार और रिश्ते को पुख़्ता बनाने का रहस्य भी छुपा है।
जवाब आसान है : उम्मीदें पूरी न होने के कारण।
लेकिन फिर यहां सवाल उठता है कि सारी उम्मीदें तो शायद अन्य रिश्तों से भी पूरी नहीं होतीं। परंतु, उम्मीदें पूरी न होने का कारण बताते हुए तो कोई भी अपने पिता, मां, भाई, बहन आदि से रिश्ते नहीं तोड़ता?
एक जान, कितने अरमान!
विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी रिश्ते से उम्मीदें स्वाभाविक हैं, लेकिन जब सारी उम्मीदें किसी एक ही व्यक्ति से लगा ली जाएं, तो उनका पूरा हो पाना नामुमकिन हो जाता है। क्या यह सच नहीं है कि आप अपने प्रियतम या जीवनसाथी के इर्दगिर्द ही सारी आशाओं और इच्छाओं का जाल बुन लेते/लेती हैं? हम उसमें पिता भी देखते हैं, मां भी, भाई-बहन भी, दोस्त भी, यहां तक कि शिक्षक, मार्गदर्शक और अक्सर सहायक या सहयोगी भी ढूंढने लगते हैं। और साफ़ कहा जाए, तो कई बार नौकर भी।
कभी सोचा है?
अपेक्षाओं की सूची बढ़ाते और पूरी न होने पर खुड़खुड़ाते कभी इन प्रश्नों पर भी सोचा है आपने-
-कैसे कोई एक व्यक्ति हमारी सारी ख़ुशियों के लिए ज़िम्मेदार हो सकता है और कैसे वह हमारी हर इच्छा की पूर्ति में सहयोग कर सकता है?
-ठीक है कि प्रिय या जीवनसाथी को विभिन्न मौक़ों पर अलग-अलग भूमिकाएं निभानी पड़ती हैं, निभानी भी चाहिए, परंतु क्या हर बार यह सम्भव हो सकता है?
- क्या प्यार करने या रिश्ता जोड़ने का मतलब एक खांचा बनाना और यह उम्मीद करना है कि सामने वाला आपके खांचे में फिट हो जाए?
-सबसे बड़ा सवाल यह है कि हम तो तमाम उम्मीदें लगा लेते हैं, किंतु क्या हम कभी ठहरकर यह सोचते हैं कि हम ख़ुद वैसी ही उम्मीदों पर कितने खरे उतर पा रहे हैं?
प्यार को पहचानें तो
शुरुआत में सिर्फ़ साथ होना ही सुख देता है, फिर अपेक्षाएं बढ़ने लगती हैं। वे पूरी होती भी हैं। व्यक्ति बदलता भी है। ज़रूरत है, तो इसे देखने वाली दृष्टि की। गैरी चैपमेन ने ‘फाइव लव लैंग्वेजेस’ नामक किताब में बताया है कि प्यार और परवाह का पता केवल ‘आईलवयू’ से नहीं चलता। बकौल गैरी, अगर पत्नी बीमार हो और कभी रुमाल भी न धोने वाला पति बाल्टीभर कपड़े लेकर बैठ जाए, तो यह हज़ार बार कहने से बेहतर प्रेम-प्रदर्शन है।
वे बताते हैं कि हर किसी की प्रेम की अपनी एक भाषा होती है। वह उस भाषा को पसंद करता है और अमूमन उसी में अपना प्रेम जताता भी है। मसलन, ऊपर के उदाहरण में उस पति की प्रेमभाषा है, सेवा। ऐसे ही प्यार की अन्य भाषाएं हैं- सराहना/प्रशंसा, उपहार, स्पर्श और गुणवत्तापूर्ण समय बिताना। सम्भव है, आपकी और आपके साथी की भाषाएं अलग-अलग हों। साथी के बारे में कोई धारणा बनाने से पहले इन्हें पहचानना आवश्यक है।
चयन पर करें विश्वास
एक बड़ी अजीब बात यह भी है कि जो रिश्ते हम ख़ुद नहीं चुनते, उन्हें निभाने पर हमारा ज़्यादा ज़ोर रहता है, किंतु जो रिश्ता हम स्वयं चुनते हैं (प्रेमी-प्रेमिका/पति-पत्नी), उसमें अलग होने का विकल्प क्यों रहता है? जन्म से मिले रिश्ते में कभी पिता या मां बदलने का ख़्याल भी नहीं आता, लेकिन पति/पत्नी या प्रेमी/प्रेमिका की जगह किसी अन्य को भी रखकर देख लेते हैं। क्यों? जबकि होना तो यह चाहिए कि जो रिश्ता हमने दिल-दिमाग़ से ख़ुद चुना है, उसे निभाने और क़ायम रखने के लिए अिधक प्रयास किए जाने चाहिए।
क्या कभी यह ख़्याल आया?