न्यूज़ीलैंड की बात निकलते ही एक अद्भुत भूभाग की अविस्मरणीय छवियां मस्तिष्क में कौंधने लगती हैं। टापुओं का देश! प्रशांत महासागर में अलसाते हुए दो बड़े भूभागों नाॅर्थ व साउथ आइलैंड के साथ ही अनगिन छोटे-छोटे टापुओं से मिलकर बना है यह मनमोहक देश। हरीतिमा, ज्वालामुखी और हिमप्रपात इसे अनोखे नैसर्गिक सौंदर्य का धनी बनाते हैं। वजह शायद यह भी है कि न्यूज़ीलैंड विश्व के उन स्थानों में है, जहां मानव की बसाहट बहुत बाद में हुई।
यानी न कोई पेड़ों को काटने वाला, न ज़मीनों को खोदने वाला, न पानी में गंदगी फेंकने वाला और न ही कोई शिकारी। एक नामालूम शायर का शेर याद आ रहा है- ‘इंसान की ख़्वाहिश की कोई इंतहा नहीं, दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद।’
ख़ैर, सोचने वाली बात यह थी कि आख़िर एक पूरा देश छोटी या फिर कुछ लम्बी छुटि्टयों में कैसे घूमा जा सकता है! सो, पहले पूरी पड़ताल की गई और भगवान भला करे इंटरनेट और ख़ासतौर पर गूगल मौसी का कि वे अपार जानकारियां दे देती हैं, हां, उसमें से सही-ग़लत की पहचान तो आपकी क्षमता पर है। बहरहाल, तय पाया गया कि इस लम्बाई में बसे देश के किसी एक सिरे से मोटरगाड़ी के द्वारा यात्रा शुरू की जाए।
हालांकि पहले कुछ हिचकिचाहट हुई कि अनजान देश में यह कैसे सम्भव होगा, मगर धन्यवाद नई तकनीक का, जो जीपीएस के माध्यम से रास्ता बताती रहती है और हमें तो बस उसे गंतव्य बताना होता है। रही बात विदेश में गाड़ी चलाने की, तो भारत के ड्राइविंग लाइसेंस के आधार पर आप न्यूज़ीलैंड में एक वर्ष तक वाहन चला ही सकते हैं। वहां भी गाड़ियां हमारी तरह सड़क की बायीं ओर चलती हैं। हम भारतीयों के हिसाब से ‘समस्या’ एक ही है कि यातायात नियमों का बेहद कड़ाई से पालन होता है। हां, हम अपनी अराजक प्रवृत्ति पर लगाम लगा लें, तो कोई दिक़्क़त नहीं।
क्राइस्टचर्च जनसंख्या के आधार पर न्यूज़ीलैंड का तीसरा बड़ा शहर है। कुछ वर्ष पहले यहां एक भीषण भूकम्प से बहुत तबाही हुई थी। कई जगहों पर पुनर्निर्माण चल रहा था, जिसे ढांपने के लिए ख़ूबसूरत पैनल्स लगे हुए थे। हमारे होटल के पास एक बहुत बड़ा मॉल दिखा। बताया गया कि उसका नाम ‘कंटेनर मॉल’ है। निकट पहुंचे तो देखा कि उसकी हर दुकान माल ढुलाई में इस्तेमाल होने वाले कंटेनरों के भीतर जमाई गई है। इससे एक अनोखा वास्तुशिल्प तो बना ही, ‘कबाड़ से कला’ का विचार भी साकार हो गया।
साउथ आइलैंड का यह प्रमुख शहर प्रशांत महासागर और ख़ूबसूरत पहाड़ियों के बीच बसा है। क्राइस्टचर्च बाग़ीचों का शहर कहलाता है और चूंकि हम अक्टूबर-नवम्बर में वहां पहुंचे थे, जब सर्दियां लौट रही थीं और गर्मियां दस्तक दे रही थीं, तो हमें बेहिसाब खिलते फूलों का नज़ारा बख़ूबी मिला। अब आप यह न कहिए कि उस समय आती गर्मियों की बात कैसे? तो जनाब, ज़रा याद कर लें कि न्यूज़ीलैंड दक्षिणी गोलार्ध में स्थित है, इसलिए वहां मौसम हमारे जैसे उत्तरी गोलार्ध के देशों की अपेक्षा उलटे होते हैं।
क्राइस्टचर्च में ही इंटरनेशनल अंटार्कटिक सेंटर भी स्थित है, जो अंटार्कटिका गए बिना वहां का जीवंत अनुभव देता है। शून्य से 18 अंश नीचे तापमान पर बहुत सारी गतिविधियां सचमुच अनोखे अनुभवों से भरी हुई थीं। और प्यारी-प्यारी ‘ब्लू पेंगुइन’ के कौतुक हमें इस उम्र में भी बच्चा बना रहे थे।
न्यूज़ीलैंड निवासी या जैसा कि वे ख़ुद को अपने राष्ट्रीय पक्षी के नाम पर ‘कीवी’ कहते हैं, बहुत मिलनसार और मददगार लोग हैं। मैं असीमित प्राकृतिक सौंदर्य के दृश्य के साथ अपने पति की एक तस्वीर ले रही थी कि एक अनजान महिला ने बड़ी मिठास से मुझसे कहा कि आप भी इनके साथ खड़ी होइए, मैं आप दोनों की फोटो खींच देती हूं। मैं दुनिया के बहुत से देशों में घूमी हूं, तरह-तरह के लोगों से मिली हूं, मगर इतना समझदारी भरा अपनापन दिल को छू गया।
न्यूज़ीलैंड रोमांचक क्रीड़ा गतिविधियों का देश है। तीव्रतम रफ़्तार का मज़ा लेना हो, हवा में उड़ना हो, पहाड़ से कूदना हो या फिर बहते पानी का सीना चीरना हो, इस देश में हरेक ऐसी विचारित या विचारातीत गतिविधि की जा सकती है। सो, हम भी निकल लिए जेट बोटिंग के लिए, यानी नाविक तेज़ी से बोट ऐसी चलाता है कि वह 360 अंश घूम जाती है।
यह तो मज़ेदार था ही, उससे भी ज़्यादा मज़ेदार थीं नाविक की बातें। उसने बताया कि वह मूलतः एक फार्म का मालिक है और जेट बोटिंग अपने शौक़ और अतिरिक्त आय के लिए करता है, क्योंकि उसका फार्म थोड़ा छोटा है। हमने बड़ी उत्सुकता से पूछा कि कितना छोटा, तो उसने एक उसांस भरते हुए कहा- ‘केवल एक हज़ार एकड़ का।’
इसके आगे हमें पूनाकैकि, यानी पैनकेक रॉक्स देखते हुए फ्रांज़ जोसफ़ शहर पहुंचना था, जिसके पास फ्रांज़ जोसफ़ तथा फॉक्स ग्लेशियर स्थित है। ग्लेशियर यानी लाखों वर्षों से बनती चली आ रही जमे हुए मीठे पानी की संरचनाएं। जीवन के लिए ये जितने महत्वपूर्ण हैं, उतने ही संुदर और आलीशान। न्यूज़ीलैंड पर्यटक सुविधा से भरपूर देश है। यहां ग्लेशियर तक जाने और छोटी-सी हाईकिंग करने का व्यवस्थित और सुरक्षित बंदोबस्त है।
आपको हेलीकाॅप्टर से ग्लेशियर पर उतारा जाता है और फिर प्रशिक्षित मार्गदर्शक के सान्निध्य में बर्फ़ के दबाव से बनती-बिगड़ती कंदराओं, दरारोंं और तालों की यादगार सैर होती है। बर्फ़ में पड़ी नीले रंग की लहरियां और तालों के जल का रंग को देखकर सुनील, नीलोहित, नीलवारि आदि शब्दों का सही मतलब समझ में आता है और नीलांजनाओं की मादकता का सबब भी।
अब चल पड़े थे हम वानाका झील के किनारे बसे एक प्यारे-से, छोटे-से शहर वानाका की ओर। न्यूज़ीलैंड के संदर्भ में ‘छोटा-सा, प्यारा-सा’ वाक्यांश एक अलग अर्थ ले लेता है। इस देश का जनसंख्या घनत्व लगभग 15 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है, जबकि भारत में यह 382 व्यक्ति है- सो थोड़े कहे को बहुत समझना! 45 किलोमीटर लम्बी और 193 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाली लेक वानाका की ख़ूबसूरती का बयान शब्दों में करना कुछ इसलिए कठिन है, क्योंकि उसके किनारे-किनारे चलते-चलते कभी उसमें हिमाच्छादित पर्वत दिखते हैं, तो कभी बादलों के टुकड़े।
कहीं घनी गहरी हरीतिमा से भरे वृक्षों का जंगल स्वयं को इस झील के निर्मल जल में निहार रहा होता है, तो कहीं रंग-बिरंगे पुष्पों की छटा होती है। यह सब कभी-कभी एक साथ, एक ही जगह भी दिख जाता है। तब बस गोस्वामी तुलसीदास की यह पंक्ति याद आती है- ‘गिरा अनयन नयन बिनु बानी।’ यानी वाणी बिना नेत्र की है और नेत्रों के वाणी नहीं है। वर्णन हो तो कैसे!
बहरहाल, दिल कर रहा था कि अब ज़रा फिर से किसी चहल-पहल भरे शहर की तरफ चलें, सो गाड़ी मोड़ दी क्वींसटाउन की ओर। वही, जिसके पास बने कावाराऊ गोर्ज पुल को ही श्रेय प्राप्त है दुनिया को बंजी जम्पिंग की सौगात देने का। बंजी जम्पिंग, यानी कमर या पैरों में रस्सी बांधकर सैकड़ों फुट ऊपर से कूद पड़ना। ऐसे और भी रोमांचक खेल हैं यहां। हैंग ग्लाइडिंग करके आसमान में उड़िए या फिर शार्क अटैक बोट के जलरोधी कॉकपिट में बैठकर वाकाटीपू झील के जल के भीतर डुबकी लगाइए। और फिर बाहर आती नौका जब छलांग लगाकर हवा में पांच फुट ऊपर तक उठ आए, तो सोचिए कि तौबा! ये मैं कहां आ फंसा!
न्यूज़ीलैंड में श्वेतवर्णी यूरोपीय लोगों के अतिरिक्त पॉलीनेशियाई मूल के जनजातीय लोगों का भी निवास है, जिन्हें ‘माओरी’ कहते हैं। देश का हर शहर, नदी, झील, पर्वत आदि के नाम अंग्रेज़ी के साथ-साथ माओरी भाषा में भी हैं। जैसे क्वींसटाउन का नाम ताहूना (छिछली खाड़ी) भी है। यूरोपीय लोगों को भी यह जगह इतनी पसंद आई थी कि उन्हें लगा यह शहर तो रानी के रहने लायक़ है। तो जी नामकरण हो गया क्वींसटाउन।
ऋतिक रोशन की पहली फिल्म ‘कहो न प्यार है’ और सोनम कपूर वाली ‘आई हेट लव स्टोरी’ के कई दृश्य इसी शहर में फिल्माए गए हैं।
यात्रा के कुछ और अद्भुत व अलौकिक अनुभव अगले अंक में।